रेलवे विजिलेंस जांच में अब नहीं चलेगी लापरवाही, GM की 3 बिंदुओं की रिपोर्ट तय करेगी सजा
भारतीय रेलवे में पारदर्शिता और जवाबदेही को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए रेलवे बोर्ड ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। बोर्ड ने विजिलेंस जांच रिपोर्ट भेजने की प्रक्रिया में बरती जा रही कमियों पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए सभी जोनल रेलवे और प्रोडक्शन यूनिट्स को नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में भेजी जाने वाली ‘फर्स्ट स्टेज एडवाइस’ (एफएसए) की फाइलें तभी स्वीकार की जाएंगी, जब वे निर्धारित नियमों पर पूरी तरह खरी उतरेंगी।
रेलवे बोर्ड के सतर्कता निदेशालय द्वारा जारी इस पत्र में कहा गया है कि हाल के दिनों में कई जोनल रेलवे से ऐसी जांच रिपोर्टें प्राप्त हुई हैं जिनमें जनरल मैनेजर की टिप्पणियां स्पष्ट नहीं थीं। भारतीय रेलवे सतर्कता नियमावली के पैरा 525.4 के तहत कुछ अनिवार्य बिंदुओं का पालन नहीं किया जा रहा था, जिससे मामलों के निपटारे में देरी हो रही थी।
अब जनरल मैनेजरों को किसी भी केस को बोर्ड को भेजने से पहले पांच मुख्य बिंदुओं पर स्पष्ट सिफारिश देनी होगी:
– जिम्मेदारी का निर्धारण: प्रत्येक संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की कितनी और कैसी जिम्मेदारी है, इसका साफ जिक्र होना चाहिए।
– दंड की प्रकृति: गलती की गंभीरता के आधार पर यह बताना होगा कि दोषी को बड़ी सजा मिलनी चाहिए, छोटी सजा या केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त है।
– विजिलेंस एंगल की पहचान: क्या मामले में भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग की मंशा थी? विजिलेंस एंगल की मौजूदगी पर स्पष्ट राय देना अनिवार्य है।
– सीबीआइ को सौंपने की सिफारिश: यदि मामला गंभीर है, तो क्या इसे सीबीआइ जैसी बाहरी एजेंसी को सौंपने की आवश्यकता है? इसके लिए ठोस तर्क देने होंगे।
– बाहरी फर्मों पर एक्शन: यदि किसी निजी ठेकेदार या कंपनी की भूमिका संदिग्ध है, तो उन्हें ब्लैकलिस्ट या डी-लिस्ट करने का प्रस्ताव भी रिपोर्ट का हिस्सा होना चाहिए।
बोर्ड ने निर्देश दिया है कि सीनियर डिप्टी जनरल मैनेजर (एसडीजीएम) की यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी होगी कि वे फाइल को जनरल मैनेजर के समक्ष प्रस्तुत करते समय इन सभी आवश्यकताओं को पूरा सुनिश्चित करें। इसका उद्देश्य यह है कि जब मामला रेलवे बोर्ड के पास पहुंचे, तो वह पूरी तरह से “पूर्ण” हो और उस पर त्वरित निर्णय लिया जा सके।
रेलवे बोर्ड के डायरेक्टर विजिलेंस (ई) अलिंद शेखर द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र को भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ की नीति के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम से जांच की प्रक्रिया में तेजी आएगी और दोषी अधिकारियों को सजा मिलने में होने वाली देरी को कम किया जा सकेगा।
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