सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका देते हुए जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत 25 हजार अनुदेशकों के बढ़े हुए मानदेय को लेकर दायर पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने अपने...
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ा झटका देते हुए जूनियर हाई स्कूलों में कार्यरत 25 हजार अनुदेशकों के बढ़े हुए मानदेय को लेकर दायर पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसले को बरकरार रखते हुए आदेश दिया है कि अनुदेशकों को 2017-18 से 17 हजार रुपये मासिक मानदेय मिलेगा। यह फैसला उन हजारों अनुदेशकों के लिए राहत लेकर आया है जो पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मात्र 7 हजार रुपये के मासिक मानदेय पर काम कर रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और पीबी वराले की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि केंद्र से पैसा न मिलने के कारण राज्य सरकार पूरा मानदेय देने के लिए बाध्य नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुदेशकों को मानदेय देने की प्रारंभिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और वह केंद्र सरकार से योगदान वसूल कर सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि लगातार दस साल से अधिक समय से काम कर रहे अनुदेशकों को स्थायी नियुक्त माना जाएगा, क्योंकि समय के साथ ऐसे पद स्वतः बन जाते हैं।
कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि अनुदेशक देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे युवाओं के दृष्टिकोण, आचरण और आदर्शों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए, उन्हें पहचानना, महत्व देना और समर्थन करना देश के बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि अनुदेशकों के वेतन को स्थिर नहीं रहने दिया जा सकता। इसे कम से कम हर तीन साल में एक बार संशोधित किया जाएगा। यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2013 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत अपर प्राइमरी स्कूलों में 11 माह के अनुबंध पर 7,000 रुपये मासिक मानदेय पर नियुक्त किए गए अनुदेशकों के लिए एक बड़ी जीत है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2017 से 17 हजार रुपये मासिक वेतन देने का आदेश दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब बरकरार रखा है।