मंडोली जेल में कैदियों की सुरक्षा पर सवाल, दिल्ली HC ने हिंसा और वसूली के आरोपों पर जताई चिंता
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंडोली जेल में एक विचाराधीन कैदी के साथ मारपीट और जबरन वसूली के आरोपों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सूत्रों के अनुसार, न्यायमूर्ति संजीव नरुला की पीठ ने कहा कि कैदियों की सुरक्षा और उपचार से संबंधित जेल परिसर की प्रशासनिक व्यवस्था और पर्यवेक्षण में चूक चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि हिरासत में बंद व्यक्तियों के जीवन और कल्याण को खतरा उत्पन्न करने वाली चूक की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
अदालत ने आदेश दिया कि कैदी की याचिका को इसी तरह के आरोपों पर शुरू की गई अदालत की निगरानी वाली सीबीआई जांच में जांच अधिकारी द्वारा की गई शिकायत के रूप में माना जाए। अदालत ने कहा कि विचाराधीन कैदी फरमान द्वारा लगाए गए आरोपों की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
यह टिप्पणी आर्म्स एक्ट के एक मामले में आरोपित फरमान की याचिका पर दी गई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जेल अधिकारियों के इशारे पर मंडोली जेल के अंदर अन्य कैदियों के साथ पैसे वसूलने के लिए उस पर हमला और उत्पीड़न किया जा रहा था। फरमान ने आरोप लगाया कि 7 जून 2024 को जेल अधिकारियों के निर्देश पर कुछ कैदियों ने उस पर हमला किया और यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई।
फरमान ने तर्क दिया कि ये कृत्य जेल के भीतर जबरन वसूली के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हैं, जिसमें कैदियों को हिंसा की धमकी देकर पेटीएम जैसे डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से पैसे देने के लिए मजबूर किया जाता था। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने कहा कि धमकी के तहत बड़ी रकम का भुगतान करने के बावजूद दुर्व्यवहार बंद नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया।
जेल प्रशासन ने आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि 28 अक्टूबर को एक पीठ द्वारा पारित आदेश के अनुसार, सीबीआई ने इसी तरह के आरोपों के संबंध में भारतीय दंड संहिता की धारा 386 और 120बी, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 61(2) सहपठित धारा 308(5) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की थी। दिल्ली सरकार के सतर्कता निदेशालय ने भी संभावित प्रशासनिक चूकों की जांच के लिए एक जांच अधिकारी नियुक्त किया है।
अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि इस याचिका को रिकॉर्ड में रखी गई सामग्री के साथ सीबीआई मामले के जांच अधिकारी को भेजा जाए, जो इसे एक शिकायत के रूप में मानेंगे। अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच के बाद जांच अधिकारी यह तय कर सकेंगे कि आरोपों के लिए अलग से मामला दर्ज करना जरूरी है या कानून के अनुसार चल रही जांच के एक हिस्से के रूप में उनकी उचित जांच की जा सकती है।
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