लाल किले के पास धमाके वाली कार से मिलीं 3 गोलियां, आतंकी मॉड्यूल की तलाश जारी
दिल्ली के लाल किले के पास चांदनी चौक में 10 नवंबर को हुंडई i20 कार में हुए धमाके के बाद जांच एजेंसियों को मौके से महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। पुलिस को मलबे से 9 एमएम की तीन गोलियां मिली हैं, जिनमें से दो जिंदा कारतूस हैं। एक सूत्र ने रविवार को बताया कि मौके से कोई हथियार नहीं मिला, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि जली हुई कार के पास सिर्फ गोलियां कैसे पहुंचीं।
यह गोलियां विशेष सुरक्षा यूनिट्स या विशेष अनुमति प्राप्त लोगों द्वारा ही रखी जा सकती हैं। आम नागरिकों को इन्हें रखने की इजाजत नहीं है। सूत्रों के अनुसार, घटना स्थल पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से भी उनके हथियारों की जांच करने को कहा गया, लेकिन किसी भी सुरक्षाकर्मी का कोई कारतूस गायब नहीं मिला है।
सुरक्षा एजेंसियां अब धमाके को अंजाम देने वाले आतंकी डॉ. उमर नबी के दिल्ली आने से पहले के रूट की भी गहन जांच कर रही हैं। सूत्रों ने बताया कि डॉ. उमर नबी 29 अक्टूबर को फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी से कार लेकर निकला था। 10 नवंबर को हमले के दिन तक, उसकी कार 50 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों में कैद हुई। इन फुटेज को एक साथ जोड़कर उसके पूरे रूट को फिर से बनाने की कोशिश की जा रही है। इसमें डॉ. उमर के हर चेकपोस्ट पार करने, सभी पार्किंग एंट्री और उसकी कार जहां-जहां रुकी, हर जगह को शामिल किया जाएगा।
इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह पता लगाना है कि फरीदाबाद से दिल्ली पहुंचने तक क्या कोई व्यक्ति उससे मिला, उसका पीछा किया या उसकी मदद की। सूत्र ने बताया कि उमर ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में कितने घंटे बिताए, यह समझने के लिए सभी बिंदुओं को जोड़ना बेहद जरूरी है।
दिल्ली धमाके से जुड़े एक नए पहलू में डॉक्टर-इमाम के साथ-साथ पेशेंट मॉड्यूल का भी खुलासा हुआ है। इस मॉड्यूल में डॉ. मुजम्मिल, लेडी डॉक्टर शाहीन और डॉ. उमर नबी मरीजों की मदद के बहाने ऐसे लोगों को ढूंढते थे, जिनका जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सके। ये डॉक्टर मरीजों के घर तक पहुंच जाते थे, वहां परिवार का जायजा लेते थे और फिर एहसान में दबाते थे। ऐसे तीन मामले सामने आ चुके हैं और ऐसे मरीजों की भी जांच एजेंसियां अब रडार पर हैं।
दिल्ली ब्लास्ट में खुद को उड़ाने वाले डॉ. उमर नबी की लाल रंग की ईको स्पोर्ट्स कार को छिपाने वाले बाशिंद को भी इसी मॉड्यूल का हिस्सा बताया जा रहा है। डॉ. मुजम्मिल ने उसके पिता का इलाज किया था, जिसके बाद उसे डॉ. शाहीन और डॉ. उमर नबी से मिलवाया गया। बाशिंद को डॉ. शाहीन के अधीन अल फलाह यूनिवर्सिटी में नौकरी दिलवाई गई और फिर उससे संदिग्ध सामान इधर-उधर कराने का काम लिया जाने लगा।
जांच एजेंसियों का मुख्य केंद्र फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी बन गई है। यूनिवर्सिटी के डॉ. मुजम्मिल शकील और डॉ. शाहीन सईद ने पूछताछ में खुलासा किया है कि आतंकी मॉड्यूल यूनिवर्सिटी को रेडिकलाइजेशन और लॉजिस्टिक कवर के तौर पर इस्तेमाल कर रहा था, यानी यूनिवर्सिटी आतंकियों के छिपने और योजना बनाने के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बनी हुई थी।
