कन्नौज: नाबालिग से दुष्कर्म का दोषी, दरिंदे को 21 साल की कठोर सजा
कन्नौज जिले में एक नाबालिग किशोरी से दुष्कर्म के मामले में न्याय की जीत हुई है। विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट, अपर सत्र न्यायाधीश अलका यादव ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी गोविंद को 21 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, अदालत ने दोषी पर 10,000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। यह फैसला उन सभी अपराधियों के लिए एक कड़ी चेतावनी है, जो मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ करने की हिम्मत करते हैं।
यह जघन्य अपराध 8 अक्टूबर 2018 को अंजाम दिया गया था। सौरिख थाना क्षेत्र के डडुअन नगला निवासी गोविंद ने उसी गांव की 16 वर्षीय नाबालिग लड़की को अपने साथ अगवा कर लिया था। पीड़िता के पिता ने 11 अक्टूबर 2018 को सौरिख थाने में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया था कि गोविंद उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया और उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। यह घटना समाज में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां ऐसी घटनाएं अक्सर सामने आती हैं।
पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल कार्रवाई की और 2 फरवरी 2019 को आरोपी गोविंद के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया। इसके बाद से यह मामला विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट की अदालत में विचाराधीन था। लगभग छह साल तक चली इस लंबी न्यायिक प्रक्रिया में, अदालत ने सभी गवाहों के बयान दर्ज किए, सबूतों का गहन विश्लेषण किया और दोनों पक्षों की दलीलों को सुना। न्यायिक प्रणाली में यह लंबी अवधि अक्सर पीड़ितों के लिए निराशाजनक हो सकती है, लेकिन इस मामले में न्याय की उम्मीद अंततः कायम रही।
मंगलवार को सुनाए गए फैसले में, अदालत ने गोविंद को दोषी ठहराते हुए उसे भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत सजा सुनाई। 21 साल की कठोर कारावास की सजा इस अपराध की गंभीरता को दर्शाती है। इसके अतिरिक्त, लगाया गया 10,000 रुपये का अर्थदंड भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दोषी यह अर्थदंड अदा नहीं करता है, तो उसे चार माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। फैसले के तुरंत बाद, दोषी गोविंद को न्यायिक अभिरक्षा में लेकर जेल भेज दिया गया।
यह फैसला पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम, 2012 के तहत आता है, जिसे बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया है। इस अधिनियम का उद्देश्य ऐसे अपराधों के लिए त्वरित और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना है। कन्नौज का यह मामला दर्शाता है कि न्यायपालिका ऐसे गंभीर मामलों में कितनी संवेदनशीलता और दृढ़ता से काम करती है। यह फैसला न केवल पीड़िता और उसके परिवार के लिए न्याय का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में ऐसे अपराधों को रोकने के लिए एक मजबूत संदेश भी भेजता है। यह दर्शाता है कि कानून बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और दोषियों को उनके किए की सजा अवश्य मिलेगी, चाहे इसमें कितना भी समय क्यों न लगे। ऐसे फैसलों से लोगों में कानून के प्रति आस्था बढ़ती है और अपराधियों में भय पैदा होता है।
