आगरा में पेयजल आपूर्ति का 100 साल से भी अधिक पुराना नेटवर्क अब शहरवासियों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन गया है। कई इलाकों में नलों से बदबूदार और मटमैला पानी आ रहा है,...
आगरा में पेयजल आपूर्ति का 100 साल से भी अधिक पुराना नेटवर्क अब शहरवासियों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन गया है। कई इलाकों में नलों से बदबूदार और मटमैला पानी आ रहा है, जिससे लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इस दूषित Agra water supply के कारण नागरिकों को पीने के पानी के लिए निजी टैंकरों या महंगे आरओ फिल्टर पर निर्भर रहना पड़ रहा है। जलकल विभाग की लापरवाही और जर्जर हो चुकी पाइपलाइनें इस समस्या की जड़ हैं, जो करोड़ों रुपये के बजट और नई योजनाओं के बावजूद जस की तस बनी हुई है।
खासकर पुराने शहर के गुदड़ी मंसूर खां, काला महल, पीपल मंडी, नाला काजी पाड़ा, मीरा हुसैनी, चक्कीपाट, बिजलीघर, बालूगंज, छीपीटोला, नाई की मंडी, गोकुल पुरा, जगदीशपुरा, किशोरपुरा और शाहगंज जैसे इलाकों में स्थिति बेहद खराब है। यहां पानी की पाइपलाइनें नालों और सीवर लाइनों के किनारे से गुजर रही हैं, जिससे लीकेज होने पर गंदा पानी सीधे पेयजल में मिल जाता है। शहीद नगर और इंद्रापुरम जैसे इलाकों में अभी तक गंगाजल का नेटवर्क नहीं पहुंचा है, और नलकूप योजना से आपूर्ति होने वाले पानी की लाइनें भी जर्जर हो चुकी हैं।
जल शोधन मानकों की अनदेखी
जलकल विभाग पानी की शुद्धता जांचने के स्पष्ट मानकों की अनदेखी कर रहा है। नियमों के अनुसार, पानी के नमूने आपूर्ति श्रृंखला के ‘अंतिम बिंदु’ से लिए जाने चाहिए, क्योंकि प्लांट से शुद्ध निकला पानी रास्ते में लीकेज या सीवर के संपर्क से दूषित हो सकता है। पहले शहर में 38 विशिष्ट स्थान चिन्हित थे, लेकिन अब कर्मचारियों को कहीं से भी नमूने लेने की छूट दे दी गई है। इसका फायदा उठाकर कर्मचारी मुख्य लाइन या प्लांट के नजदीक से नमूने भरकर रिपोर्ट ‘ओके’ कर देते हैं, जिससे समस्या की वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती।
ब्रिटिश काल में बिछाई गई ये लाइनें अब अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं और ‘अंडरग्राउंड चोक पॉइंट’ बन गई हैं। पुराने शहर की संकरी गलियों में पाइपलाइनें सीवर की पुरानी दीवारों से सटी हुई हैं, यही कारण है कि सुबह नल खुलने पर अक्सर लोगों को सीवर जैसी गंध का सामना करना पड़ता है। स्थानीय लोग दशकों से इन लाइनों को बदलने की मांग कर रहे हैं, लेकिन भारी खर्च का हवाला देकर प्रशासन इसे टालता रहा है। जब तक ये ‘शहरी धमनियां’ नहीं बदली जाएंगी, तब तक प्लांट में कितना भी शुद्ध पानी तैयार कर लिया जाए, वह घरों तक पहुंचते-पहुंचते जहरीला ही रहेगा, जिससे नागरिकों की सेहत पर लगातार खतरा बना रहेगा।
‘जल मित्र’ योजना की सीमाएं
विभाग ने ‘जल मित्र’ योजना के तहत स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को पोर्टेबल डिजिटल डिवाइस के साथ फील्ड में उतारा है, ताकि वे घर-घर जाकर पीएच लेवल और टीडीएस की जांच कर सकें। हालांकि, यह पहल नीतिगत स्तर पर सराहनीय है, लेकिन तकनीकी स्तर पर अधूरी है। यदि पाइपलाइनें ही सड़ी हुई हैं, तो ये ‘जल मित्र’ केवल प्रदूषण की पुष्टि कर सकती हैं, उसे ठीक करना उनके बस में नहीं है। जब तक विभाग के मुख्य इंजीनियर और कर्मचारी स्वयं अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक करोड़ों की डिवाइस केवल डेटा जुटाने का एक उपकरण बनकर रह जाएंगी।
पानी की जांच केवल पारदर्शिता देखकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पैमानों पर होनी चाहिए, जिसमें अवशिष्ट क्लोरीन (0.2 से 0.5 पीपीएम), टर्बिडिटी (1 एनटीयू से कम) और बैक्टीरियोलॉजिकल टेस्ट (ई-कोलाई और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की अनुपस्थिति) शामिल हैं। वर्तमान में कई इलाकों में टर्बिडिटी 5 से 10 एनटीयू तक मिल रही है, और ई-कोलाई की मौजूदगी पेयजल में मानव अपशिष्ट के मिश्रण को दर्शाती है। शहरवासी भारी जल कर चुकाने के बावजूद शुद्ध पानी से वंचित हैं और उनकी शिकायतें अक्सर अनसुनी कर दी जाती हैं, जिससे उनके बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।