गयाजी का तिलकुट: 150 साल का सफर, 5000 परिवारों की रोजी-रोटी
गयाजी की गलियों में इन दिनों तिलकुट की सोंधी खुशबू लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना यह पारंपरिक उद्योग आज लघु और कुटीर उद्योग के रूप में जिले की पहचान बन चुका है। तिलकुट ने न सिर्फ अपने अनूठे स्वाद के लिए ख्याति प्राप्त की है, बल्कि यह हजारों परिवारों के लिए रोजगार का एक बड़ा आधार भी साबित हुआ है।
इसके बावजूद, यह पारंपरिक उद्योग अब तक जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) से वंचित है, जो इसकी असली पहचान को स्थापित करने और इसे व्यापक बाजार तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। सूत्रों के अनुसार, जिले में पांच हजार से अधिक परिवार सीधे तौर पर तिलकुट उद्योग से जुड़े हुए हैं। अकेले गयाजी शहर में ही 250 से अधिक तिलकुट की दुकानें संचालित हो रही हैं। इनमें रमना रोड, टिकारी रोड और स्टेशन रोड जैसे प्रमुख स्थान शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, मोहनपुर प्रखंड के डांगरा में लगभग 20 और टिकारी में 15 से 18 दुकानें तिलकुट की बिक्री में सक्रिय हैं।
तिलकुट उद्योग का प्रमुख सीजन नवंबर के मध्य से फरवरी के मध्य तक चलता है, जिसमें 20 नवंबर से 20 फरवरी की अवधि को विशेष महत्व दिया जाता है। विशेष रूप से 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर इसकी बिक्री अपने चरम पर पहुंच जाती है। इस सीजन के दौरान, रोजाना लगभग 50 क्विंटल तिलकुट की खपत होती है, जो इसकी अपार लोकप्रियता का प्रमाण है।
तिलकुट की खासियत यह है कि इसे पूरी तरह से हाथ से तैयार किया जाता है, जिसमें किसी भी मशीन का उपयोग नहीं होता है। यही कारण है कि इसे एक शुद्ध लोकल प्रोडक्ट माना जाता है। तिल को कड़ाही में भूनने, गुड़ या चीनी की चाशनी को सही तापमान पर मिलाने और फिर मथौड़ी से कूटकर उसे गोल आकार देने की प्रक्रिया में गहन कारीगरी और कौशल की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि वर्षों से तिलकुट का स्वाद एक जैसा बना हुआ है और उपभोक्ताओं को पसंद आता है।
तिलकुट उद्योग के जीआई टैग से वंचित होने के कारण इसकी पहचान और बाजार तक पहुंच सीमित है। तिलकुट निर्माण एवं विक्रेता संघ के अध्यक्ष लालजी प्रसाद बताते हैं कि उद्योग की विशालता और महत्व के बावजूद, जीआई टैग प्राप्त करने में अभी तक सफलता नहीं मिली है। यह विडंबना है कि जिले के मगही पान को जीआई टैग मिल चुका है, जबकि तिलकुट जैसे महत्वपूर्ण उत्पाद के लिए वर्ष 2017 से निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन भौगोलिक पहचान अब तक नहीं मिल पाई है। यह अभाव इस उद्योग के विकास और निर्यात क्षमता को सीमित कर रहा है।
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