गोरखपुर में अनजान चेहरों का बढ़ता डेरा, रोहिंग्या होने की आशंका से बढ़ी चिंता
गोरखपुर शहर के हर कोने और बाहरी इलाकों में अनजान लोगों के बढ़ते डेरे ने स्थानीय लोगों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है। ये लोग सड़कों के किनारे, खाली जमीनों और बागों में झुग्गी-झोपड़ियां बनाकर रह रहे हैं। इनकी न तो कोई स्पष्ट पहचान है और न ही इनके पास कोई वैध दस्तावेज। सूत्रों के अनुसार, जब इनसे बातचीत करने की कोशिश की जाती है तो ये लोग बताने से कतराते हैं, लेकिन आपस में बात करते समय इनकी बोली-भाषा से रोहिंग्या या बांग्लादेशी होने की आशंका जताई जा रही है।
शहर के राजघाट, अमरुतानी, महेवा, ट्रांसपोर्टनगर, रामगढ़ताल, देवरिया बाइपास, खोराबार, एम्स क्षेत्र, कैंट रेलवे स्टेशन, शाहपुर, खजांची बांसफोड़ बाजार, चिलुआताल, घोसीपुरवा, गोरखनाथ, चौरी चौरा, करमहा ओवर ब्रिज, गुलरिहा और नौसड़ समेत कई अन्य स्थानों पर ऐसी झुग्गियां देखी जा सकती हैं। इसके अलावा, शहर के विभिन्न मार्गों पर बाहरी लोग ठेले और वैन लगाकर दवा बेचने का कारोबार भी कर रहे हैं, जहां माइक पर अजीबोगरीब दावों के साथ उपचार का प्रचार किया जाता है। ये लोग चौराहों पर कलम, पंखे और वाहन के सामान भी बेचते नजर आते हैं, लेकिन अपनी पहचान बताने में आनाकानी करते हैं।
ग्रामीण इलाकों जैसे कैंपियरगंज, पिपराइच, गोला, उरुवा, बांसगांव, बड़हलगंज, गगहा, सहजनवां और खजनी में भी खेतों और पुलिया के किनारे ऐसे बाहरी लोगों ने डेरा डाल लिया है। ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों और महिलाओं में भय बना रहता है, क्योंकि इन लोगों के आने-जाने का कोई ठिकाना नहीं है। नियमों के अनुसार, बाहर से आने वाले हर व्यक्ति का सत्यापन होना चाहिए, लेकिन जिले में यह प्रक्रिया लगभग ठप पड़ी है।
सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों का मानना है कि गोरखपुर जैसे संवेदनशील शहर में इस तरह की स्थिति बेहद खतरनाक है। बिना सत्यापन के बसेरा अपराधियों को छिपने और शहर में घुलने-मिलने का मौका दे रहा है। प्रशासन को समय-समय पर अभियान चलाकर सत्यापन सुनिश्चित करना चाहिए, अन्यथा बड़ी वारदातों का खतरा बढ़ सकता है।
सूत्रों ने बताया कि ये लोग जब आधार कार्ड दिखाते हैं तो उसे असम और कोलकाता का बताते हैं, लेकिन आपस में झगड़ते समय बांग्लादेशी भाषा का प्रयोग करते हैं। कुछ समय पहले आयुष विश्वविद्यालय के निर्माण में भी ऐसे कई बाहरी लोग काम करते पाए गए थे, जिन्होंने परिसर में ही झोपड़ियां बना ली थीं। बाद में उन्हें वहां से हटाया गया। यह भी देखा गया है कि इनमें से कुछ महिलाएं कबाड़ बीनने का काम करती हैं, जबकि युवक नगर निगम के कूड़ा उठाने वाले वाहनों के साथ चल रहे हैं। इस अनियंत्रित घुसपैठ से स्थानीय सुरक्षा और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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