धन से किसका दिल भरता है? हमें तो बस ‘अम्मी मैं आ गया’ वापस चाहिए
लाल किले के पास कार में हुए ब्लास्ट को दो हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन ई-रिक्शा चालक मोहसिन मलिक के परिवार के लिए वक्त जैसे ठहर सा गया है। उस धमाके की गूंज आज भी उनके घर की खामोशी में सुनाई देती है, जिसने उनसे मोहसिन को छीन लिया। परिवार पर दर्द, सदमा और अनगिनत सवाल भारी हैं। मां के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे, जबकि पिता ने खामोशी ओढ़ ली है, कुछ कहने की कोशिश करते हैं तो गला रुंध जाता है।
जांच एजेंसियों ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए 20 से ज्यादा संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। दिल्ली सरकार ने मृतकों के परिवारों के लिए 10 लाख रुपये के मुआवजे का भी ऐलान किया है। लेकिन मोहसिन की मां संजीदा बेगम के लिए यह आर्थिक सहायता कोई मायने नहीं रखती। उनका दर्द बयां करते हुए वे कहती हैं, ‘धन से किसका दिल भरता है? हमें तो बस उसका ‘अम्मी मैं आ गया’ वापस चाहिए था।’ पिता रफीक मलिक की सूनी आँखें यह कह रही हैं कि अब उनका बेटा कभी वापस नहीं लौटेगा।
मेरठ के लोहिया नगर थाना क्षेत्र में मोहसिन का परिवार एक छोटे से किराये के कमरे में रहता है। जब संवाददाता वहां पहुंचा, तो पिता रफीक मलिक ने ही रास्ता दिखाया। घर के अंदर का माहौल सन्नाटे में डूबा था। मां संजीदा बेगम चारपाई पर बैठकर आंसू पोंछ रही थीं। आसपास कुछ महिलाएं और बच्चे भी थे, लेकिन किसी के पास कहने को कुछ नहीं था।
मोहसिन की मां ने बताया कि ब्लास्ट की रात वे सो चुकी थीं, तभी छोटे बेटे को दिल्ली से फोन आया। फोन सुनते ही वह ऐसे खड़ा हुआ कि मानो जमीन खिसक गई हो। बेटे ने बताया, ‘अम्मी, दिल्ली में बम ब्लास्ट हो गया है और मोहसिन भाई का कुछ पता नहीं चल रहा है। मैं जा रहा हूं।’ मां ने साथ चलने को कहा तो उसने कहा कि वह पहुंचकर बताएगा और तुरंत निकल गया। मां का मन बेचैन था।
मेरठ में ही रहने वाले बेटी और दामाद ने ब्लास्ट की खबर मिलने पर मां-पिता को अपने घर बुलाया। वहां से दिल्ली चलने की तैयारी थी, तभी मोहसिन के भाई का फोन आया। उसने कहा, ‘आप और अब्बू मत आइए, हम लोग वहीं आ रहे हैं।’ उसकी आवाज से मां को अनहोनी का एहसास हो गया था। उन्होंने जिद करके दिल्ली पहुंचीं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। छोटी बहू नाजिसा ने मोहसिन के शव की शिनाख्त कर ली थी। पोस्टमार्टम के बाद सफेद कपड़े में लपेटकर शव सौंप दिया गया।
संजीदा बेगम ने बताया कि मोहसिन 15 दिन पहले ही घर आया था। एक हफ्ते पहले फोन पर उसने कहा था, ‘आपके हाथ का बना गोश्त खाने का मन कर रहा है।’ मां ने कहा था, ‘आजा, मैं बना दूंगी।’ वह हर रविवार को परिवार से बात करता था, जिसमें बेटा, बहू और पोता-पोती शामिल होते थे। ब्लास्ट से एक दिन पहले वाले रविवार को बात नहीं हो पाई थी। अब तो कभी बात नहीं हो पाएगी, वह कभी वापस नहीं आएगा।
मोहसिन अपने पिता रफीक मलिक का मंझला बेटा था। 2012 में दिल्ली की सुल्ताना से उसकी शादी हुई थी। उसके 11 साल की बेटी और 9 साल का बेटा है। शादी के बाद वह अपने पिता और भाइयों के साथ हैडलूम का काम करता था। पॉवर मशीनों के आने के बाद 12-13 घंटे मेहनत करने पर भी उसे सिर्फ 400 रुपये मिलते थे।
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