यूपी में क्रिटिकल केयर यूनिटों की जांच में लीपापोती, मरीजों की जान खतरे में
गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज मुहैया कराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश विधानमंडल की महिला एवं बाल विकास संबंधी बैठक में क्रिटिकल केयर यूनिटों (CCU) की जांच के निर्देश दिए गए थे। इस निर्देश के बावजूद, स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई जांच में लीपापोती की गई है। विभाग ने केवल गिने-चुने बड़े और नामी अस्पतालों की CCU की जांच कर खानापूरी की, जबकि छोटे और मझोले अस्पतालों की जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई। इसका सीधा असर गंभीर रूप से बीमार मरीजों की जान पर पड़ रहा है, जो खतरे में हैं।
लखनऊ में लगभग एक हजार निजी अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जिनमें से करीब 300 अस्पतालों में क्रिटिकल केयर यूनिट का संचालन होता है। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से कई यूनिटों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। कागजों में एमबीबीएस डॉक्टरों की तैनाती दिखाई गई है, लेकिन असल में यूनिटों का संचालन दूसरी विधाओं के डॉक्टर कर रहे हैं। यह स्थिति गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
महिला एवं बाल विकास संबंधी बैठक में निजी अस्पतालों की CCU की जांच कराने के निर्देश स्वास्थ्य महानिदेशक को दिए गए थे। हालांकि, महानिदेशालय स्तर से इस आदेश के पालन के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। लखनऊ में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने पांच सदस्यीय कमेटी गठित की थी, जिसमें हर सदस्य को अलग-अलग इलाकों के निजी अस्पतालों की जांच का प्रभारी बनाया जाना था। लेकिन अफसरों ने केवल पांच-छह बड़े अस्पतालों की जांच करके ही रिपोर्ट स्वास्थ्य महानिदेशक को भेज दी। दुबग्गा के आसपास के करीब 10 अस्पतालों में छापेमारी के दौरान कई खामियां मिलने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इस लापरवाही के कारण मरीजों की सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
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