बिहार विधानसभा: 13 ‘दिग्गजों’ का पत्ता कटा, ‘हंगामा किंग’ समेत कई चर्चित चेहरे बाहर
बिहार विधानसभा के आगामी सत्र में सदन को अपनी आवाज से गुंजायमान करने वाले 13 अनुभवी चेहरे इस बार नजर नहीं आएंगे। जनता ने इन ‘दिग्गजों’ को चुनाव में नकार दिया है, जिनमें कई पूर्व विधायक और अपनी मुखर शैली के लिए चर्चित ‘हंगामा किंग’ भी शामिल हैं। इन अनुभवी नेताओं की अनुपस्थिति से विधानसभा के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आने की संभावना है, जिससे नए चेहरों को अपनी पहचान बनाने का अवसर मिलेगा।
पटना से भुवनेश्वर वात्स्यायन के अनुसार, बिहार विधानसभा के हर सत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले कुछ खास चेहरे अपनी मुखरता के लिए जाने जाते थे। ये नेता बात-बात पर सदन के वेल में पहुंच जाते थे, अध्यक्ष के आसन के नीचे फर्श पर धरने पर बैठ जाते थे और प्रश्न काल के दौरान बीच में ही हस्तक्षेप कर अपनी बात मनवाकर ही दम लेते थे, भले ही आसन उन्हें मना करता रहे।
ऐसे चेहरों में सबसे पहले दरौली के भाकपा (माले) विधायक सत्यदेव राम का नाम आता है। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सत्यदेव राम अपनी सीट पर खड़े हो जाते और तेज आवाज में अपनी बात रखना शुरू कर देते थे। आसन उन्हें लाख समझाता कि उन्हें अपनी बात रखने का मौका मिलेगा, लेकिन वह अपनी बात कहकर ही मानते थे। इस बार सत्यदेव राम दरौली से चुनाव हार गए हैं।
इसी श्रेणी में भाकपा (माले) विधायक दल के नेता महबूब आलम का नाम भी है। वह भी बात-बात पर वेल में पहुंच जाते थे। बलरामपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक महबूब आलम भी इस बार चुनाव हार चुके हैं। भाकपा विधायक दल के नेता सूर्यकांत पासवान भी इस बार विधानसभा में नहीं दिखेंगे, जो अपने दल की ओर से खूब बातें करते थे।
शून्यकाल में नियमित रूप से सक्रिय रहने वाले ढाका के भाजपा विधायक पवन जायसवाल की आवाज भी इस बार विधानसभा में नहीं गूंजेगी, क्योंकि वह भी चुनाव हार गए हैं। ध्यानाकर्षण की सूचना देने वालों में लगातार राजद के डॉ. रामानुज प्रसाद का नाम आता रहा है, लेकिन अब वह भी विधानसभा में नजर नहीं आएंगे। हाल के दिनों में मसौढ़ी की राजद विधायक रेखा देवी भी विधानसभा में खूब सक्रिय दिखती थीं और विपक्ष के वेल में पहुंचने पर सबसे पहले वही जाती थीं। इस बार रेखा देवी भी चुनाव हार गई हैं।
इस बार विधानसभा में नहीं दिखने वाले तीन बड़े दिग्गजों में दो राजद के हेवीवेट और एक कांग्रेस के हैं। राजद के अवध बिहारी चौधरी, जो विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं और नेता प्रतिपक्ष के बगल में बैठते थे, इस बार चुनाव हार गए हैं। इसी तरह, राजद के वरिष्ठ विधायकों में से एक ललित यादव भी इस बार विधानसभा में नजर नहीं आएंगे, जो ध्यानाकर्षण या शून्यकाल की सूचना को लेकर लगातार सक्रिय रहते थे। राजद के समीर महासेठ और कांग्रेस के अजत शर्मा भी इस बार चुनाव हारने के बाद सदन का हिस्सा नहीं होंगे।
इन 13 अनुभवी नेताओं की हार से बिहार विधानसभा में एक नई शुरुआत होगी। सदन में नए चेहरे अपनी जगह बनाएंगे और बहस व नीतियों में एक नई ऊर्जा देखने को मिल सकती है। यह बदलाव बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय का सूचक है।
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