बदरीनाथ धाम में बंद हुईं खडग पुस्तक, शीतकाल तक गूंजेगी वेद ऋचाओं की गूंज
उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम में शीतकाल की तैयारियां जोरों पर हैं। पंच पूजाओं के क्रम में तीसरे दिन, विशेष पूजा-अर्चना के बाद खडग पुस्तक को बंद कर दिया गया है। इस परंपरा के साथ ही अब शीतकाल तक भगवान नारायण की स्तुति में गूंजने वाली वेद ऋचाओं का स्वर थम जाएगा।
मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने बताया कि श्री बदरीनाथ धाम के कपाट बंद करने की प्रक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं। पारंपरिक पंच पूजाओं का प्रारंभ 21 नवंबर से हुआ था। रविवार को तीसरे दिन, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रावल अमरनाथ नंबूदरी, धर्माधिकारी राधाकृष्ण थपलियाल, प्रभारी धर्माधिकारी स्वयंबर सेमवाल, वेदपाठी रविंद्र भट्ट और अमित बंदोलिया ने मंदिर में खडग पुस्तक का पूजन किया और तत्पश्चात उसे बंद कर दिया गया। इसके साथ ही दोपहर से वेद ऋचाओं का वाचन अगले छह महीनों के लिए स्थगित हो गया है।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, बदरीनाथ धाम के कपाट 25 नवंबर को अपराह्न 2 बजकर 56 मिनट पर शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाएंगे। कपाट बंद होने से एक दिन पूर्व, 24 नवंबर को, माता लक्ष्मी को गर्भ गृह में भगवान नारायण के साथ विराजमान होने का विशेष न्योता दिया जाएगा। यह परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जहाँ यात्रा काल के दौरान नारायण से बिछड़ चुकीं मां लक्ष्मी को कपाट बंद होने के अवसर पर मिलन का निमंत्रण मिलता है। यह क्षण श्रद्धालुओं के लिए विशेष भावनात्मक महत्व रखता है।
मंदिर समिति ने कपाट बंद होने के अवसर पर विशिष्ट अतिथियों के आगमन की उम्मीद जताई है। सोमवार से मंदिर को फूलों से सजाया जाएगा। इस महत्वपूर्ण अवसर पर मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी, कार्यपालक मजिस्ट्रेट विजय प्रसाद थपलियाल, मंदिर अधिकारी राजेंद्र चौहान, ईओ नगर पंचायत सुनील पुरोहित, थाना प्रभारी नवनीत भंडारी, प्रशासनिक अधिकारी कुलदीप भट्ट, विकास सनवाल सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहेंगे।
यह भी उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व आदिकेदारेश्वर और शंकराचार्य मंदिर के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए हैं, जहाँ शिवलिंग को पके चावल से ढका गया था। बदरीनाथ धाम की ये परंपराएं न केवल धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक हैं।
