उत्तर प्रदेश में साक्षरता की राह: कुछ जिले चमके, कुछ पिछड़े, 2027 तक लक्ष्य पर जोर
उत्तर प्रदेश में साक्षरता दर बढ़ाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे ‘नव भारत साक्षरता कार्यक्रम’ में प्रदेश के कुछ जिलों ने जहां सराहनीय प्रगति की है, वहीं कई जिले अभी भी लक्ष्य से काफी पीछे हैं। यह केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम 1 अप्रैल 2022 से शुरू होकर 31 मार्च 2027 तक चलेगा, जिसका मुख्य उद्देश्य 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के असाक्षरों को 200 घंटे के विशेष मॉड्यूल के माध्यम से साक्षर बनाना है।
कार्यक्रम के तहत सभी गतिविधियां ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से संचालित की जा रही हैं। इसमें प्रचार-प्रसार, स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और वर्ष में दो बार साक्षरता परीक्षा का आयोजन शामिल है। यह योजना स्कूलों के स्तर पर क्रियान्वित हो रही है, जहां रैलियों, नुक्कड़ नाटकों, सर्वे, स्वयंसेवक प्रशिक्षण और कक्षाओं के नियमित संचालन जैसे कार्य किए जा रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के कई जिलों में इस योजना की गति काफी धीमी है। संभल जिले में सबसे कम प्रगति दर्ज की गई है, जहां 10,300 के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 80 असाक्षरों की पहचान हो पाई है, जो केवल 0.78 प्रतिशत है। इसके विपरीत, जिन जिलों में प्रचार-प्रसार, सर्वे और स्वयंसेवक प्रशिक्षण मजबूत है, वहां प्रगति तेजी से देखी जा रही है।
बागपत, हाथरस और कुशीनगर जैसे जिलों में सामुदायिक भागीदारी और स्कूल इकाइयों की सक्रियता के चलते कार्यक्रम को गति मिली है। बागपत जिले ने 79.36 प्रतिशत की प्रगति के साथ सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है, जहाँ 6,900 के लक्ष्य के मुकाबले 5,476 असाक्षरों को चिन्हित किया गया है। हाथरस में 53.14 प्रतिशत, कुशीनगर में 49.75 प्रतिशत, महोबा में 43.50 प्रतिशत, अलीगढ़ में 43.20 प्रतिशत और देवरिया में 42.07 प्रतिशत प्रगति दर्ज की गई है।
वहीं, संभल के अलावा प्रयागराज, रायबरेली और जौनपुर जैसे जिलों में कम जागरूकता, सर्वे की धीमी गति और स्वयंसेवकों की निष्क्रियता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इन पिछड़े जिलों को लेकर बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने हाल ही में हुई एक समीक्षा बैठक में चिंता जताई है। उन्होंने धीमे चल रहे जिलों में विशेष अभियान चलाकर प्रगति तेज कराने के निर्देश दिए हैं, ताकि 2027 तक साक्षरता के निर्धारित लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके।
