करोड़ों की लागत, फिर भी मुजफ्फरपुर की ट्रैफिक लाइटें बंद, चालान कटने से अनजान चालक
मुजफ्फरपुर शहर में यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाने के उद्देश्य से करोड़ों की लागत से विभिन्न चौराहों पर ट्रैफिक लाइटें स्थापित की गईं। जहाँ इन लाइटों का लाभ दिखना चाहिए था, वहीं शहर के कई महत्वपूर्ण चौराहों पर ये लाइटें मात्र दिखावे के लिए लगी हैं। सदर अस्पताल मोड़, सरैयागंज टावर, आरडीएस चौक और मिठनपुरा जैसे कई प्रमुख स्थानों पर ये लाइटें या तो शुरू ही नहीं हुईं या कुछ समय ट्रायल के बाद बंद कर दी गईं।
इस अव्यवस्था का सीधा खामियाजा आम जनता भुगत रही है। सूत्रों के अनुसार, शहर में लगभग 27 जगहों पर ट्रैफिक लाइटें लगाई गई थीं, जिन पर 150 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई। इसके बावजूद, सदर अस्पताल मोड़ और कंपनीबाग रोड जैसे स्थानों पर, जहां कुछ मीटर की दूरी पर ही लाइटें लगाई गई हैं, वहाँ भी व्यवस्था बिगड़ी हुई है। सदर अस्पताल मोड़ की लाइट करीब डेढ़ साल से बंद है, जबकि कंपनीबाग रोड की लाइट ही एकमात्र चालू है।
स्थानीय लोगों और वाहन चालकों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि जब इन लाइटों को चालू ही नहीं रखना था, तो करोड़ों रुपये खर्च करके इन्हें क्यों लगाया गया? यह पैसे की बर्बादी है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब ट्रैफिक लाइटें बंद रहती हैं, तो वाहन चालक अनजाने में यातायात नियमों का उल्लंघन कर देते हैं और उनका चालान कट जाता है। उन्हें पता ही नहीं चलता कि वे कोई नियम तोड़ रहे हैं।
कुछ जगहों पर लाइटों को गलत तरीके से लगाने के कारण भी समस्या बढ़ी है। मिठनपुरा चौक जैसे स्थानों पर, जहाँ सड़क की चौड़ाई अधिक है और जाम की समस्या न के बराबर है, वहाँ भी लाइटें लगा दी गईं। आरडीएस चौक के स्थानीय व्यवसायी संतोष कुमार के अनुसार, यहाँ लाइट की कोई आवश्यकता नहीं थी। अगर नियम पालन कराना ही था, तो सिर्फ कैमरे लगा दिए जाते। अब तो कई लाइटें विशाल पेड़ों की डालियों और पत्तों से ढक गई हैं, जिससे उनका अस्तित्व भी नजर नहीं आता। इस पूरी परियोजना की विफलता पर सवाल उठ रहे हैं और प्रशासन से इस दिशा में उचित कदम उठाने की मांग की जा रही है।
