गीता जीवन और मृत्यु दोनों का समाधान: सरसंघचालक मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क में आयोजित दिव्य गीता प्रेरणा उत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि आज की दुनिया जिस तरह से मूल्यों, नीति और मानवता के संकट से गुजर रही है, वह महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन के सामने की स्थिति के समान है। अर्जुन भी मोह और शोक से विह्वल होकर युद्ध छोड़ने की कगार पर थे, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए गीता के ज्ञान ने उनमें धर्म, साहस और कर्तव्य की भावना जागृत की।
सरसंघचालक ने इस बात पर जोर दिया कि गीता जीवन के अत्यंत कठिन क्षणों में भी मनुष्य को अंधकार से निकालकर दृढ़ता, समाधान और निर्भयता प्रदान करने वाला दिव्य शास्त्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गीता केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की एक प्रक्रिया है, और जो इसे अपनाएगा वही संकटों से उबरेगा।
मोहन भागवत ने कहा कि जब पूरा विश्व अव्यवस्था, संघर्ष और नैतिक भ्रम से जूझ रहा है, तब भगवद्गीता ही वह शाश्वत मार्गदर्शक है जो मानवता को संतुलन और धर्म के पथ पर पुनः स्थापित कर सकती है। उन्होंने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि गीता जीवन का विज्ञान भी है और मृत्यु का समाधान भी। इसलिए, मनुष्य चाहे जिए या मरे, गीता ही उसके अस्तित्व का आधार होनी चाहिए।
दिव्य गीता प्रेरणा उत्सव का उद्देश्य भगवद् गीता के सार्वभौमिक संदेशों को बढ़ावा देना और जीवन को बेहतर बनाने के लिए इसके उपदेशों को प्रसारित करना है। इस कार्यक्रम में हजारों श्रद्धालु, विद्वान और गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। इस आयोजन को ‘श्रीकृष्ण कृपा जियो गीता परिवार, उत्तर प्रदेश’ द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके प्रेरणा स्रोत पूज्य गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज हैं।
लखनऊ में अपने प्रवास के दौरान, मोहन भागवत ने कई आध्यात्मिक और संगठनात्मक कार्यक्रमों में भाग लिया। इसके पश्चात् वे अयोध्या के लिए रवाना हो गए, जहाँ वे 24 नवंबर को गुरु तेग बहादुर के शहीदी दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। अयोध्या में उनका साधुओं, संतों, बुद्धिजीवियों और संघ के पदाधिकारियों के साथ मिलने का भी कार्यक्रम है।
