आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे मुआवजा घोटाला: कई अधिकारी जांच के घेरे में, DM को सौंपी गई कमान
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान भूमि अधिग्रहण के मुआवजे में बड़े पैमाने पर हुई धांधली का मामला सामने आया है, जिसमें अब कई अधिकारियों की गर्दन फंस सकती है। राजस्व परिषद के अध्यक्ष अनिल कुमार ने इस गंभीर मामले की जांच लखनऊ के जिलाधिकारी विशाख जी को सौंपी है। परिषद अध्यक्ष ने अपनी प्रारंभिक जांच में तत्कालीन एसडीएम, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और लेखपाल की भूमिका को संदिग्ध पाया है।
जिलाधिकारी को इस मामले से जुड़े सभी प्रकरणों की गहन जांच कर अगले दो सप्ताह में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही, यह भी निर्देश दिया गया है कि घोटाले में संलिप्त पाए जाने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और लाभान्वितों से गलत तरीके से जारी की गई मुआवजे की राशि की तत्काल वसूली की जाए।
यह घोटाला एक्सप्रेसवे परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा 13 मई 2013 को लखनऊ, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर नगर, उन्नाव और हरदोई के जिलाधिकारियों को उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) को भूमि उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे। उसी समय 302 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे का संरेखण (एलाइनमेंट) भी जारी कर दिया गया था।
सूत्रों के अनुसार, लखनऊ के सरोसा-भरोसा गांव में गाटा संख्या-तीन की 68 बीघा से अधिक भूमि के करीब दो बीघा हिस्से पर अनुसूचित जाति के भाई लाल व बनवारी लाल को वर्ष 2007 से पहले से काबिज दिखाकर 1,09,86,415 रुपये का मुआवजा जारी कर दिया गया था। तत्कालीन लेखपाल ने लाभार्थी और उसके पड़ोसी के बयानों के आधार पर अपनी रिपोर्ट में उक्त भूमि पर वर्ष 2007 से पहले से अनुसूचित जाति के लाभार्थियों को कास्तकार दर्शाया था। उत्तर प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम-1950 की धारा 122 बी (4 एफ) के तहत तत्कालीन राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार और एसडीएम ने भी इसी रिपोर्ट के आधार पर लाभार्थी को मुआवजे का पात्र मानते हुए राशि जारी कर दी।
मामले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब दो नवंबर 2022 को अपर आयुक्त प्रशासन लखनऊ मंडल को पुनरीक्षण के लिए एक आवेदन में दावा किया गया कि लाभार्थी को जिस भूमि के लिए मुआवजा दिया गया है, उसमें चौहद्दी का उल्लेख नहीं है। इसके बाद 18 मार्च, 2024 को लाभार्थी के वकील ने राजस्व परिषद में इस निर्णय को चुनौती दी।
परिषद के अध्यक्ष अनिल कुमार की अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यूपीडा से भूमि अधिग्रहण का पूरा रिकॉर्ड तलब किया। जांच में पाया गया कि भू-अभिलेखों में हेराफेरी कर ग्राम समाज की जमीन पर अनुसूचित जाति के व्यक्तियों का कब्जा दर्शाया गया और उन्हें नियमों का उल्लंघन कर मुआवजा राशि का भुगतान कर दिया गया। लखनऊ के सरोसा-भरोसा गांव के अलावा नटकौरा, दोना और तीन अन्य गांवों सहित एक्सप्रेसवे से जुड़े आठ अन्य जिलों में भी इसी तरह की गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है। इस पूरे प्रकरण में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की उम्मीद है।
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