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न्याय के छात्र के रूप में विदाई: सीजेआई गवई ने देश सेवा पर संतोष व्यक्त किया

By Nov 22, 2025

भारत के 52वें प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ को शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय की औपचारिक पीठ के समक्ष भावभीनी विदाई दी गई। 23 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे सीजेआई गवई ने अपने लगभग छह माह के कार्यकाल को न्याय के छात्र के रूप में समाप्त करते हुए पूर्ण संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जब मैं आखिरी बार इस अदालत से बाहर निकलूंगा तो मुझे इस बात का संतोष रहेगा कि मैं देश के लिए जो कुछ भी कर सकता था, वह कर पाया।

14 मई को प्रधान न्यायाधीश का पदभार संभालने वाले सीजेआई गवई के कार्यकाल में वक्फ कानून से लेकर पर्यावरण संरक्षण और न्यायिक सुधारों तक कई महत्वपूर्ण फैसलों ने व्यापक असर डाला। विदाई समारोह के दौरान, निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश ने अपने कार्यों से संतोष जताते हुए कहा कि लगभग चार दशकों की अपनी यात्रा का समापन वे न्याय के एक छात्र के रूप में कर रहे हैं।

सीजेआई गवई ने अपने संबोधन में संविधान के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई। उन्होंने कहा, ‘मेरा हमेशा से मानना रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति, जज, वकील हमारे संविधान में प्रदत्त समानता, न्याय, स्वतंत्रता और भाईचारे के सिद्धांतों के आधार पर काम करता है और मैंने भी संविधान से दायरे में रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभाने का प्रयास किया, जो हम सभी के लिए प्रिय है।’

बार एसोसिएशनों की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कविता पाठ किया, जिसने सीजेआई गवई को भावुक कर दिया। इस अवसर पर नवनियुक्त सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन सहित कई न्यायाधीश मौजूद थे। महाराष्ट्र के अमरावती जिले से आने वाले सीजेआई गवई, प्रधान न्यायाधीश के पद पर पहुंचने वाले पहले बौद्ध और दूसरे दलित न्यायाधीश हैं।

उन्होंने अपने दो दशक से अधिक के न्यायिक सेवा काल में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में 400 से अधिक फैसले लिखे। उनके कार्यकाल की एक उल्लेखनीय घटना छह अक्टूबर को हुई जब एक वकील ने उनकी पीठ पर जूता फेंका था, लेकिन सीजेआई गवई ने उस घटना के बावजूद असाधारण संयम बनाए रखा, जिसकी व्यापक सराहना की गई थी।

सीजेआई गवई की पीठ के कुछ अहम फैसलों में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पर सुनवाई शामिल है। इस मामले में उन्होंने कानून की संवैधानिकता को मानते हुए कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई, पर पूरे कानून पर स्थगन से इनकार कर दिया था। उनके कार्यकाल ने भारतीय न्यायपालिका में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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