विपक्ष आरोपों की राजनीति छोड़े, देशहित में रचनात्मक भूमिका निभाए
बिहार विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की शानदार जीत के बाद, विपक्षी दलों का रवैया आलोचना का विषय बना हुआ है। कई विपक्षी नेता चुनाव परिणामों की निष्पक्षता पर ही सवाल उठा रहे हैं, जो कि 2014 के बाद से ही जारी एक पुरानी प्रवृत्ति है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राजग को बिहार में यह अप्रत्याशित जीत यूँ ही मिल गई?nnइस जीत के पीछे के कारणों को समझने के लिए, राजग और महागठबंधन के चुनाव प्रचार के तरीकों में अंतर को देखना आवश्यक है। जहाँ एक ओर राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ के खिलाफ यात्रा निकालकर राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास किया, वहीं गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर अंतिम समय तक अनिश्चितता बनी रही। इसके विपरीत, कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की चुनाव प्रचार के दौरान की गैर-मौजूदगी और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी की तस्वीरें, मतदाताओं को भ्रमित करने वाली साबित हुईं। इसकी तुलना में, तेजस्वी यादव जैसे युवा नेता भी पहले चरण के मतदान के बाद आराम फरमाते दिखे, जबकि 74 वर्षीय नीतीश कुमार ने खराब स्वास्थ्य के बावजूद सड़क मार्ग से रोड शो किए। यह स्पष्ट करता है कि मतदाता किसे अधिक गंभीरता से लें: वे जो चुनाव को एक पर्यटन के रूप में देखते हैं, या वे जो इसे जीवन-मरण का प्रश्न मानकर मैदान में उतरते हैं।nnबिहार चुनाव में एक निर्णायक कारक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की रणनीतिक कुशलता रही। चुनाव पूर्व राजग कई मोर्चों पर घिरा था, जिसमें जदयू और लोजपा (आर) के बीच खींचतान, सीट बंटवारे की जटिलता, और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद को लेकर अनिश्चितता शामिल थी। अमित शाह ने बिहार में लगातार डटे रहकर न केवल इन चुनौतियों का समाधान किया, बल्कि भाजपा को सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर बागियों को मनाया, कार्यकर्ताओं से संवाद कर उनकी नाराजगी दूर की, और लोजपा (आर) तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के वोटों को राजग के सहयोगियों में स्थानांतरित कराने में भी सफलता प्राप्त की। दिल्ली में प्रधानमंत्री पद और बिहार में मुख्यमंत्री पद के खाली न होने की बात कहकर उन्होंने विपक्ष के एक बड़े हथियार को निष्क्रिय कर दिया।nnसूत्रों के अनुसार, विपक्ष मतदान में कथित हेराफेरी को तथ्यपूर्ण तरीके से साबित करने में असमर्थ रहा है। मतदाता सूची से लाखों लोगों के नाम काटे जाने के बावजूद जनता के बीच से व्यापक विरोध का स्वर न उठना इस बात का प्रमाण है कि चुनाव प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हुई। राजग की जीत का श्रेय उसके जमीनी स्तर पर किए गए कार्यों को जाता है। उसे पिछले चुनाव की तुलना में महागठबंधन से लगभग नौ प्रतिशत अधिक मत मिले। दूसरी ओर, महागठबंधन अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने में ही सफल रहा और अपने लिए कोई नया वोट आधार वर्ग नहीं ढूंढ पाया।nnबिहार का जनादेश स्पष्ट रूप से विपक्ष के लिए आत्ममंथन का संदेश है। केवल आरोप लगाने की राजनीति से उसका कायाकल्प संभव नहीं है। यदि कांग्रेस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की मशीनरी पर जीत का श्रेय देती है, तो यह सवाल अवश्य पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेस सेवा दल कहाँ है? विपक्ष को अब रचनात्मक भूमिका निभाते हुए देश के विकास में सरकार के साथ मिलकर योगदान देना चाहिए।”
काम करना चाहिए।
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