बरेली मंडल के खेतों का ‘सोना’ घट रहा: 72,800 नमूनों की जांच में खुलासा
बरेली मंडल में खेतों की मिट्टी लगातार अपनी उर्वरा शक्ति खो रही है। हाल ही में कराई गई 72,800 मृदा नमूनों की प्रयोगशाला जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मंडल के चारों जिलों – बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर और बदायूं – के खेतों में नाइट्रोजन और जीवांश कार्बन की मात्रा बेहद चिंताजनक स्तर तक कम हो गई है। यह स्थिति किसानों के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती की लागत को नियंत्रित करने में बड़ी बाधा बन रही है।
सूत्रों के अनुसार, अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग और लगातार एक ही तरह की फसलें उगाने की प्रवृत्ति ने मिट्टी के पोषक तत्वों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इन 72,800 नमूनों के दो-स्तरीय परीक्षण में पाया गया कि नाइट्रोजन और जीवांश कार्बन की कमी फसलों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा है। इस कमी की पूर्ति के लिए किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। यदि इन पोषक तत्वों की कमी को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में उपज पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है।
जांच में फास्फोरस और पोटाश की मात्रा में भी कुछ कमी पाई गई है, हालांकि अभी उनकी स्थिति सामान्य से मध्यम बनी हुई है। समय रहते उचित कदम न उठाए जाने पर इनकी मात्रा भी न्यून हो सकती है। अच्छी खबर यह है कि पीएच, ईसी, आयरन, मैंगनीज, जिंक, सल्फर, बोरान और कॉपर जैसे अन्य पोषक तत्वों की स्थिति फिलहाल सामान्य है।
भूमि संरक्षण के उप निदेशक नरेंद्र कुमार ने किसानों से अपील की है कि वे अपनी मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाएं। उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण सुझाव दिया है कि खेतों में फसल के अवशेष बिल्कुल न जलाएं। अवशेष जलाने से मिट्टी के महत्वपूर्ण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके बजाय, धान की कटाई के बाद पलेवा करके यूरिया का छिड़काव करें और अवशेषों को मिट्टी में पलट दें। गर्मी के मौसम में खेत खाली होने पर ढैंचा जैसी फसलें उगाकर उन्हें हरी खाद के रूप में खेत में जुतवा दें।
इसके अतिरिक्त, दलहनी फसलों, जैसे उड़द और मूंग, को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है। इन फसलों की जड़ें वायुमंडल से नाइट्रोजन को अवशोषित कर मिट्टी में स्थिर करती हैं। फली तोड़ने के बाद इन फसलों को भी खेत में पलट देने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इन उपायों को अपनाने से न केवल खेतों की उपजाऊ क्षमता बनी रहेगी, बल्कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत में भी कमी आएगी और उत्पादन में वृद्धि होगी।
फिलहाल, मृदा परीक्षण के आधार पर किसानों को मृदा कार्ड उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिनमें उनकी मिट्टी की स्थिति के अनुसार उर्वरकों के प्रयोग की सलाह दी गई है। अब ब्लॉक स्तर पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है, ताकि किसानों को उनकी जमीन के लिए सबसे उपयुक्त फसल उत्पादन और उर्वरक प्रबंधन की सटीक जानकारी मिल सके। इससे लागत कम करने और उत्पादकता बढ़ाने में और मदद मिलेगी।
