आपराधिक न्याय प्रशासन उपेक्षित क्षेत्र: जस्टिस ललित ने जताई चिंता, सुधारों की वकालत
नई दिल्ली। पूर्व प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित ने आपराधिक न्याय प्रशासन को सरकारी तंत्र में सबसे उपेक्षित क्षेत्र करार देते हुए इसमें व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। उन्होंने कहा कि पुलिस की जांच शाखा को सामान्य कानून-व्यवस्था से जुड़े पुलिस बल से अलग किया जाना चाहिए ताकि आपराधिक कानूनों के दुरुपयोग को रोका जा सके और किसी निर्दोष को बेवजह परेशानी का सामना न करना पड़े।
‘एकम न्याय फाउंडेशन’ द्वारा आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए जस्टिस ललित ने कहा कि पिछले 42 वर्षों के अपने अनुभव में उन्होंने पाया है कि देश का आपराधिक न्याय शास्त्र और उसका प्रशासन उपेक्षा का शिकार रहा है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों और जांचकर्ताओं के पेशेवर साधनों और शिक्षा की कमी पर भी प्रकाश डाला, जो प्रभावी जांच के लिए आवश्यक है।
जस्टिस ललित ने 1973 के सीआरपीसी में हुए बदलावों का ज़िक्र करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा गवाहों के बयान दर्ज करने की पुरानी व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया था। अब पुलिस द्वारा सीआरपीसी की धारा-161 या बीएनएसएस के तहत दर्ज बयानों पर निर्भर रहा जाता है, जिन पर हस्ताक्षर नहीं होते। इसके परिणामस्वरूप, सुनवाई के समय कई बार बयानों को पलट दिया जाता है, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है।
उन्होंने देश में आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि की बेहद निराशाजनक दर पर चिंता व्यक्त की, जो लगभग 20 प्रतिशत है। धारा 498ए जैसे मामलों में तो यह दर पांच प्रतिशत से भी कम है। जस्टिस ललित ने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि जेलों में बंद पांच में से चार विचाराधीन कैदियों को अंततः बरी कर दिया जाता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या हम ऐसे व्यक्तियों को हिरासत में रख रहे हैं जो अंततः निर्दोष साबित होंगे या जिनके विरुद्ध अपराध साबित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है और इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है।
