एससी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू हो: CJI गवई, ‘IAS का बच्चा गरीब जैसा नहीं’
नई दिल्ली: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने अनुसूचित जाति (SC) के आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने की अपनी वकालत को एक बार फिर दोहराया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक आईएएस अधिकारी के बच्चों को किसी गरीब खेत मजदूर के बच्चों के बराबर नहीं माना जा सकता। CJI गवई ने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक और सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके SC समुदायों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाना चाहिए, जैसा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए ‘इंद्र साहनी’ मामले में लागू है।
एक कार्यक्रम ‘इंडिया एंड द लिविंग इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन एट 75 इयर्स’ में बोलते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने स्वीकार किया कि उनकी इस राय की काफी आलोचना हुई है, लेकिन वे इसे सही मानते हैं। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि जजों को आमतौर पर अपने फैसलों को समझाने की जरूरत नहीं होती और उनके रिटायरमेंट में अब एक हफ्ता ही बचा है। गवई ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने 2024 में राज्यों को सुझाव दिया था कि SC-ST में भी क्रीमी लेयर की पहचान कर उन्हें आरक्षण का लाभ न दिया जाए।
CJI गवई ने भारतीय संविधान की गतिशीलता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. बीआर अंबेडकर चाहते थे कि संविधान स्थिर न रहे, बल्कि समय के साथ बदले, विकसित हो और समाज की जरूरतों के अनुसार काम करे। उन्होंने संविधान संशोधन की शक्तियों पर मौजूद विभिन्न मतों का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोग इसे बहुत ज्यादा मानते हैं, जबकि कुछ इसे बहुत कठिन बताते हैं, और दोनों ही तरह की आलोचनाएं हमेशा से मौजूद रही हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि अंबेडकर के संविधान-विमर्श वाले भाषण हर कानून के छात्र को पढ़ने चाहिए। उन्होंने अंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए बताया कि केवल समानता से प्रगति संभव नहीं है और केवल स्वतंत्रता से शक्तिशाली लोग कमजोरों पर हावी हो सकते हैं, इसलिए समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व तीनों ही एक प्रगतिशील समाज के लिए आवश्यक हैं।
भावुक होते हुए CJI गवई ने संविधान की शक्ति को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संविधान की वजह से ही देश में दो अनुसूचित जाति के राष्ट्रपति बने और आज की राष्ट्रपति एक अनुसूचित जनजाति समुदाय से हैं। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि अमरावती के एक साधारण नगर निगम स्कूल से पढ़कर वे देश के सर्वोच्च न्यायिक पद तक पहुंचे हैं, और यह सब भारतीय संविधान के कारण ही संभव हो पाया है।
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