चुनाव आयुक्तों की शिकायत पर कैबिनेट सचिवालय ने क्यों नहीं की कार्रवाई, सामने आई बड़ी वजह | india politics
देश के चुनाव आयोग के भीतर प्रशासनिक कामकाज और शक्तियों के केंद्रीयकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सार्वजनिक हो गया है। आरटीआई के जरिए सामने आए दस्तावेजों से पता चलता है कि कैबिनेट सचिवालय ने दो चुनाव आयुक्तों द्वारा एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ भेजी गई शिकायतों पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। सचिवालय का मानना था कि यदि आयोग के पूर्ण बहुमत या आधिकारिक फैसले के बिना इस पर कदम उठाया जाता है, तो इसे एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के कामकाज में कार्यपालिका का हस्तक्षेप माना जा सकता है।
यह पूरा मामला डेपुटेशन पर आए सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग के कामकाज और उनके द्वारा जारी किए गए एक आदेश से जुड़ा है। चुनाव आयुक्तों ने आरोप लगाया था कि उक्त अधिकारी ने बिना किसी पूर्व चर्चा या अनुमति के अधिकारियों के बीच काम का बंटवारा कर दिया था, जो स्थापित नियमों और नए अधिनियम के खिलाफ था। हालांकि, कैबिनेट सचिवालय ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह पत्र व्यक्तिगत क्षमता में भेजे गए थे और आयोग की तरफ से कोई सामूहिक आधिकारिक सूचना नहीं थी, इसलिए इस स्तर पर कोई भी दंडात्मक कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।
इस प्रशासनिक गतिरोध से यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि देश के शीर्ष चुनावी निकाय के भीतर आंतरिक फैसलों और पदानुक्रम को लेकर किस तरह की असहज स्थितियां बन रही हैं। भविष्य में ऐसे प्रशासनिक विवादों से बचने के लिए चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और समन्वय को और अधिक पारदर्शी बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि लोकतांत्रिक संस्था की निष्पक्षता पर कोई आंच न आए।
