भारतीय क्रिकेटर हनुमा विहारी के करियर के पतन की दर्दनाक दास्तां | sports news
भारतीय टेस्ट क्रिकेट में कभी ‘दीवार’ के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले हनुमा विहारी आज किसी पहचान के मोहताज नहीं, लेकिन उनका करियर आज उस मोड़ पर है जहां से वापसी लगभग नामुमकिन सी लगती है। आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में जन्मे विहारी ने देश के लिए कई यादगार पारियां खेली हैं, जिनमें साल 2021 का सिडनी टेस्ट मैच सबसे ऊपर आता है। उस ऐतिहासिक मुकाबले में उन्होंने गंभीर हैमस्ट्रिंग इंजरी से जूझते हुए क्रीज पर घंटों संघर्ष किया था और भारत को एक हारी हुई बाजी हार से बचा लिया था। शरीर की परवाह किए बिना देश के लिए खेलने वाले इस खिलाड़ी को बदले में जो मिला, वह भारतीय खेल तंत्र की एक कड़वी सच्चाई को बयां करता है।
जुलाई 2022 के बाद से हनुमा विहारी को भारतीय टेस्ट टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके बाद से वह कभी राष्ट्रीय जर्सी में नजर नहीं आए। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपना दर्द साझा करते हुए बताया था कि टीम से बाहर होने के बाद किसी ने उनका हालचाल तक नहीं पूछा। मुख्य कोच से आखिरी बातचीत के बाद से चयनकर्ताओं और प्रबंधन की ओर से पूरी तरह से खामोशी छा गई, जिससे उनकी सारी उम्मीदें टूट गईं।
विहारी के करियर के इस अचानक पतन के पीछे सिर्फ मैदान पर खराब प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक दखलअंदाजी भी मुख्य वजह रही। साल 2024 में रणजी ट्रॉफी के दौरान आंध्र क्रिकेट संघ के साथ उनका विवाद सामने आया था। एक स्थानीय राजनीतिक नेता के बेटे को डांटने के बाद उन पर कप्तानी छोड़ने का दबाव बनाया गया। जब उन्होंने इस तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाते हुए खिलाड़ियों के हस्ताक्षर वाला पत्र सार्वजनिक किया, तो उनका पूरा करियर ही दांव पर लग गया। इसके बाद न तो इंडिया-ए में उनका चयन हुआ और न ही चयनकर्ताओं की बैठकों में कभी उनके नाम पर विचार किया गया। सोलह टेस्ट मैचों में देश के लिए 839 रन बनाने वाले इस खिलाड़ी की उपेक्षा यह दर्शाती है कि कई बार खेल प्रतिभा पर व्यवस्था भारी पड़ जाती है।
