दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर लग सकती है रोक, गृह मंत्रालय की कमेटी ने की सिफारिश | delhi news
दिल्ली के राजनीतिक और सामाजिक मानचित्र पर विरोध प्रदर्शनों का पर्याय बन चुका जंतर-मंतर अब इतिहास का हिस्सा बनने की कगार पर है। गृह मंत्रालय की एक उच्चस्तरीय कमेटी ने इसे आधिकारिक धरना-प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने की संस्तुति की है। इस बदलाव से देश की राजधानी में आम जनता, किसानों और छात्रों के अधिकारों की आवाज उठाने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आ सकता है। संसद भवन से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के कारण यह जगह हमेशा से सत्ता तक अपनी बात पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम रही है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बड़े आंदोलन
नब्बे के दशक की शुरुआत में बोट क्लब पर प्रतिबंध लगने के बाद जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए अधिकृत किया गया था। साल 1993 में छात्र आंदोलनों से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर देश के सबसे बड़े जन-आंदोलनों का गवाह बना। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का ऐतिहासिक जनलोकपाल आंदोलन हो या फिर निर्भया कांड के बाद न्याय के लिए उमड़ा जनसैलाब, इसी जमीन ने देश की दशा और दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा नर्मदा बचाओ आंदोलन और तमिलनाडु के किसानों का सूखा राहत प्रदर्शन भी यहीं पर आयोजित हुआ था, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं।
नए प्रस्तावित विकल्प और प्रशासनिक चुनौतियां
जंतर-मंतर के विकल्प के तौर पर प्रशासन ने रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड का सुझाव दिया है। हालांकि, इन नए स्थलों की संसद और सत्ता के मुख्य केंद्रों से दूरी प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। जानकारों का मानना है कि संसद के करीब होने के कारण जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों का असर सीधे सरकार पर पड़ता था, जबकि बाहरी इलाकों में होने वाले आयोजनों से शासन पर वह दबाव नहीं बन पाएगा। इस निर्णय से लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
