उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने क्यों नहीं उतारा तीसरा उम्मीदवार, क्या था अंकों का गणित | rajya sabha elections
उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर चल रही तमाम अटकलों पर उस समय विराम लग गया जब समाजवादी पार्टी ने अपने को केवल दो सीटों तक सीमित रखते हुए तीसरा उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारने का फैसला किया। इस कदम के बाद अब सभी 10 सीटों पर उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने का रास्ता साफ हो गया है। चुनाव प्रक्रिया के तहत नामांकन की समय सीमा समाप्त होने के बाद मैदान में केवल 10 ही प्रत्याशी बचे हैं।
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के आधार पर 37 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। दो सुरक्षित सीटों के बाद समाजवादी पार्टी के पास पर्याप्त संख्याबल तो था, लेकिन तीसरी सीट के लिए आवश्यक अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन गया था। पिछली बार हुए चुनावों में सामने आई क्रॉस-वोटिंग के कड़वे अनुभवों को ध्यान में रखते हुए पार्टी नेतृत्व ने इस बार किसी भी प्रकार के राजनीतिक जोखिम से बचने का निर्णय लिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समाजवादी पार्टी तीसरा उम्मीदवार उतारती, तो उसे सत्तारूढ़ दल के रणनीतिक कौशल और संभावित बगावत का सामना करना पड़ता। पार्टी ने बागी विधायकों की वापसी और अन्य छोटे दलों के समर्थन की उम्मीद जरूर की थी, लेकिन समीकरण पक्ष में न बैठने के कारण अंतिम समय में कदम पीछे खींचने पड़े। इस रणनीतिक फैसले से जहां एक ओर चुनाव में टकराव टल गया है, वहीं दूसरी ओर यह घटनाक्रम भविष्य के राजनीतिक गठजोड़ के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
