विपक्ष क्यों नहीं भुना पाता सत्ता विरोधी लहर, क्या है इसके पीछे की सियासी रणनीति | india politics news
राजनीतिक गलियारों में एंटी-इनकंबेंसी यानी सत्ताधारी दल के खिलाफ जनता का गुस्सा हमेशा से चर्चा का केंद्र रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में खासकर हिंदी पट्टी के राज्यों में प्रो-इनकंबेंसी का ट्रेंड तेजी से उभरा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी अक्सर इस स्थिति को स्वाभाविक मानने से इनकार करते हुए इसके पीछे चुनावी तंत्र की कमियों या अन्य वजहों का अंदेशा जताते हैं। उनका तर्क है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद भी कुछ खास चेहरों के खिलाफ जनता का आक्रोश सामने क्यों नहीं आता। (india politics news)
हालांकि, इस तर्क की जमीनी हकीकत दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी डूसू चुनावों में भी उलट साबित होती है, जहां केंद्रीय स्तर की ताकतों के बजाय स्थानीय छात्र संगठनों का प्रबंधन और वैचारिक पकड़ मायने रखती है। सिर्फ सरकारों के खिलाफ माहौल होना ही काफी नहीं होता, बल्कि उसे जनहित के मुद्दों के साथ भुनाना असल चुनौती है। विपक्षी दल कई बार जनता के मन में यह नैरेटिव गढ़ने में सफल रहते हैं कि मौजूदा सरकार जनविरोधी नीतियां अपना रही है, जिसका उदाहरण 2024 के आम चुनाव में संविधान बदलने के नैरेटिव के रूप में दिखा था।
इसके विपरीत, बीजेपी और एनडीए शासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में सत्ता पक्ष ने एक अलग ही चक्रव्यूह तैयार किया है। मध्य प्रदेश में ‘मिस्टर बंटाधार’, बिहार में ‘जंगल राज’ और उत्तर प्रदेश में ‘माफिया राज’ जैसे पुराने दौर की यादों को ताजा कर सत्ताधारी दल ने विपक्ष को हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। जब चैलेंजर यानी विपक्षी दल अपनी ही पुरानी सरकारों के दाग धोने में उलझे रहते हैं, तब वे सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने में नाकाम साबित होते हैं। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी कांग्रेस का हाशिये पर जाना इसी राजनीतिक विफलता का परिणाम है।
