IAS दुर्गा शक्ति नागपाल की सफाई, जज को फोन कर दबाव बनाने के आरोपों पर बोलीं – सरकारी जमीन की पैरवी थी
मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने जज को फोन कर दबाव बनाने और अवमानना की कार्यवाही के आरोपों पर अपनी ओर से सफाई पेश की है। नागपाल ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य केवल सरकारी जमीन के एक लंबित मामले में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था। उन्होंने जज के पत्र में लगाए गए कई आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि फोन पर न तो केस के गुण-दोष पर कोई चर्चा हुई और न ही किसी आदेश या फैसले के संबंध में बात की गई।
सरकारी जमीन का मामला और मंडलायुक्त का पक्ष
मंडलायुक्त ने बताया कि यह मामला बेशकीमती नजूल भूमि से जुड़ा है, जो 1997 से लगभग 30 वर्षों से लंबित है। उनके अनुसार, इस भूमि पर 2008 से बिना विधिक प्रपत्र के एक कथित पट्टा दर्शाया जा रहा है, जबकि भूमि सरकारी है और 1985 में पट्टा निरस्त होने के बाद सरकार के नाम दर्ज है। इस सरकारी भूमि पर एक निजी विद्यालय भी संचालित हो रहा है। पदभार ग्रहण के बाद, सरकारी भूमि के संरक्षण और लंबित वाद में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना उनका उद्देश्य था। जब पीठासीन अधिकारी के अवकाश से लौटने की जानकारी नहीं मिल सकी, तो केवल यह जानने के लिए फोन किया कि वे कब लौट रही हैं।
हाईकोर्ट का सख्त रुख और अवमानना की कार्यवाही
वहीं, हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मंडलायुक्त के इस कृत्य को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार और न्याय प्रशासन में बाधा बताया है। न्यायालय ने कहा कि इस मामले में आपराधिक अवमानना के तहत विचार किए जाने की आवश्यकता है और मुख्य न्यायाधीश से दिशा-निर्देश प्राप्त करने के बाद इसे संबंधित अवमानना कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए। न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की एकल पीठ ने यह आदेश ज्योति विद्या मंदिर स्कूल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें स्कूल ने लंबित वाद को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी।
जज का पत्र और स्थानांतरण की मांग
मामले की सुनवाई के दौरान सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान का जनपद न्यायाधीश को भेजा गया पत्र भी प्रस्तुत किया गया। पत्र में कहा गया कि मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने 15 जुलाई को उन्हें फोन कर लंबित मुकदमे के संबंध में बात करने का प्रयास किया। सिविल जज द्वारा इनकार करने पर, मंडलायुक्त पर उन्हें भला-बुरा कहने का आरोप लगाया गया। इसी आधार पर जज ने मामले को अपनी अदालत से स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अधीनस्थ अदालतों को अपमान और दबाव से मुक्त रखा जाना चाहिए, ताकि पीठासीन अधिकारी बिना किसी भय के अपने न्यायिक दायित्वों का निर्वहन कर सकें। किसी भी व्यक्ति द्वारा अदालत पर दबाव बनाने का प्रयास न्याय प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करता है।
