बाराबंकी: गुरु के उपदेश से नाग हुआ अहिंसक, मंजीठा में लगता है आस्था का सैलाब
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का मंजीठा गांव एक अनूठी लोककथा का गवाह है, जहां सदियों पहले एक नागा साधु के उपदेश ने एक विषैले नाग को अहिंसक बना दिया था। यह घटना आज भी स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र है और हर साल गुरु पूर्णिमा के अवसर पर यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है। इस मेले में दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जो इस कथा में अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
यह मेला सिर्फ गुरु पूर्णिमा तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि नाग पंचमी तक पंद्रह दिनों तक चलता है। श्री नाग देवता मंदिर परिसर में रात-दिन भक्तों का तांता लगा रहता है। लोग अपनी मन्नतें लेकर आते हैं, आभार व्यक्त करते हैं या फिर उस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा को महसूस करने आते हैं। लखनऊ, रायबरेली, सीतापुर जैसे कई जिलों से श्रद्धालु इस छोटे से गांव की ओर रुख करते हैं। वे मिट्टी की छोटी मालिया में चावल और दूध भरकर चढ़ाते हैं, जो उनकी अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
ग्रामीणों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कथा के अनुसार, मंजीठा कभी घने जंगलों से घिरा था। एक दिन एक नागा साधु अपने शिष्यों के साथ वहां से गुजर रहे थे। चरवाहों ने उन्हें एक खूंखार विषैले सर्प के बारे में चेतावनी दी, लेकिन साधु नहीं रुके। जब नाग उन पर झपटा, तो साधु ने उसे रोका और जीव हत्या को पाप बताते हुए अहिंसा का उपदेश दिया। कहते हैं, इस उपदेश के प्रभाव से नाग शांत हो गया और एक बांबी में समा गया, जिसके बाद उसने किसी को नहीं काटा।
इस चमत्कारिक घटना के बाद, ग्रामीणों ने उस स्थान पर एक छोटा मंदिर बनवाया, जो आज मंजीठा के नाग देवता मंदिर के रूप में विख्यात है। यह मेला उस गुरु की वाणी की वार्षिक स्मृति है, जिसने बिना बल प्रयोग के, केवल शब्दों की शक्ति से एक खतरनाक प्राणी की प्रकृति बदल दी थी। यह गुरु-शिष्य परंपरा और करुणा की शक्ति का उत्सव है, जो दर्शाता है कि सच्चा ज्ञान किसी भी हृदय को रूपांतरित कर सकता है।
