मेडिकल किताबों में ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ की पुरानी सोच पर NMC की सख्ती, वैज्ञानिकता पर सवाल
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने मेडिकल शिक्षा से ‘वर्जिनिटी’ यानी कौमार्य से जुड़ी सभी अवैज्ञानिक और भेदभावपूर्ण धारणाओं को हटाने के सख्त निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद, मौजूदा शैक्षणिक सत्र में पढ़ाई जा रही फॉरेंसिक मेडिसिन की कई किताबों में ऐसे पुराने और गलत विवरण शामिल हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को सही ठहराते हैं। फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने इस गंभीर मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है।
पहले की फॉरेंसिक मेडिसिन की किताबों में तथाकथित ‘वर्जिनिटी के संकेत’ बताए जाते थे, जिनमें हाइमन, योनि, लैबिया, क्लिटोरिस और योनि की चौड़ाई जैसी चीजों का जिक्र होता था। इन किताबों में ‘फिंगरटेस्ट’ भी सिखाया जाता था, जिसका उद्देश्य यह जांचना होता था कि महिला ‘यौन संबंधों की आदी है या नहीं।’ विशेषज्ञों के अनुसार, इन तरीकों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और ये महिला की गरिमा, निजता और शारीरिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
एमजीआईएमएस, सेवाग्राम के फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. इंद्रजीत खांडेकर के अनुसार, NMC ने सितंबर 2024 में जारी नए CBME पाठ्यक्रम दिशानिर्देशों में स्पष्ट किया है कि वर्जिनिटी के ये तथाकथित संकेत गलत हैं और इनका कोई वैज्ञानिक या कानूनी महत्व नहीं है। NMC ने यह भी निर्देश दिया कि मेडिकल छात्रों को अदालतों को यह बताने के लिए प्रशिक्षित किया जाए कि ऐसे टेस्ट अवैध और अवैज्ञानिक हैं, भले ही अदालत जांच का आदेश दे।
2022 में NMC ने अंडरग्रेजुएट फॉरेंसिक मेडिसिन का सिलेबस बदला था, जिसमें साफ लिखा गया कि वर्जिनिटी से जुड़े सभी परीक्षण अमानवीय, भेदभावपूर्ण और अवैज्ञानिक हैं। इसके बाद लेखकों और प्रकाशकों को भी किताबों से यह सामग्री हटाने के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि, हाल की कई किताबों की समीक्षा में पाया गया कि कुछ जगह केवल सतही बदलाव किए गए हैं। अध्याय की शुरुआत में फिंगर टेस्ट को गलत बताया गया है, लेकिन अंदर के पन्नों में वही पुराने विवरण लगभग जस के तस मौजूद हैं। कई किताबें अब भी महिलाओं को ‘वर्जिन’, ‘फॉल्सवर्जिन’ या ‘डिफ्लॉरेटेड’ जैसी श्रेणियों में बांटती हैं। डॉ. खांडेकर ने कहा, “यह कहना कि टेस्ट गलत है, लेकिन उसी के नतीजे पढ़ाना खतरनाक है। किसी महिला के यौन इतिहास को जानने का कोई मेडिकल तरीका नहीं है।”
कुछ किताबों में यह भी लिखा गया है कि रेप केस में फिंगर टेस्ट नहीं होना चाहिए, लेकिन शादी-विवाद या तलाक के मामलों में किया जा सकता है, जिसे विशेषज्ञ पूरी तरह गलत बताते हैं। डॉ. खांडेकर के अनुसार, NMC के निर्देश 2022 के अंत में आ गए थे, लेकिन 2024 और 2025 में छपी किताबों में भी पुराने कंटेंट मौजूद हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई टेस्ट रेप मामलों में अमानवीय है, तो वही टेस्ट शादी से जुड़े मामलों में कैसे सही हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पहले ही साफ कर चुकी हैं कि वर्जिनिटी टेस्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
एक शहर के मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक शिक्षक ने बताया कि वे छात्रों को साफ कहते हैं कि ‘यौन संबंधों की आदी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करें। यह टेस्ट अवैज्ञानिक है और न तो किया जाना चाहिए, न ही रिकॉर्ड किया जाना चाहिए। भारतीय फॉरेंसिक मेडिसिन अकादमी के सचिव डॉ. राजेश ढेरे ने कहा कि मेडिकल-लीगल किताबों की सख्त निगरानी जरूरी है, क्योंकि इन्हीं पर अदालतें भरोसा करती हैं। इस अवैज्ञानिक सोच का सार्वजनिक स्वास्थ्य और महिलाओं के अधिकारों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि यह गलत सूचनाओं को बढ़ावा देता है।
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