कालिदास की तपोस्थली कटिहार में नील सरस्वती पूजा: कमल पर वीणा की श्रद्धा, व्यवस्था में ISKCON की भूमिका
महाकवि कालिदास की तपोस्थली के रूप में विख्यात कटिहार का बेलवा गांव इस बार माता नील सरस्वती की पूजा को लेकर विशेष उत्साह में है। यह प्राचीन धाम न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व भी रखता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महाकवि कालिदास ने इसी स्थान पर तपस्या कर दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था, जिससे वे विश्वविख्यात कवि बने।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, प्राचीन काल में यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा था और यहां काले-नीले रंग की विशाल पत्थर की माता सरस्वती की प्रतिमा थी। मुगल काल में इस प्रतिमा को क्षति पहुंचाई गई और बाद में चोरी के प्रयास भी हुए। 1980 के दशक में मूल प्रतिमा चोरी हो गई, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था अटूट रही। वर्तमान में कोलकाता के एक व्यवसायी के सहयोग से सफेद संगमरमर की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसकी पिछले दस वर्षों से विधिवत पूजा-अर्चना हो रही है।
मंदिर में नियमित भोग और अनुष्ठान संपन्न होते हैं। यहां दो विशाल प्राचीन शिवलिंग भी मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीनता का प्रमाण हैं। खुदाई में मिली प्राचीन ईंटें, धातु की मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष एक उन्नत प्राचीन सभ्यता की ओर इशारा करते हैं।
पिछले तीन वर्षों से अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कान) ने इस प्राचीन मंदिर को गोद लिया है। मंदिर परिसर में माता सरस्वती के साथ भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इस्कान के सेवक मंदिर की व्यवस्था, नियमित पूजा और संरक्षण कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। आस्था, इतिहास और संस्कृति का यह संगम बेलवा को एक विशिष्ट पहचान दिलाता है। iskcon की भागीदारी ने यहां की व्यवस्था को सुदृढ़ किया है, जिससे श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव मिल रहा है।
