आधुनिक दिल्ली में भी पुरानी सोच हावी, सिर्फ 2% पुरुष नसबंदी; महिलाओं पर बोझ (Delhi family planning)
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक तरफ जहां आधुनिक जीवनशैली और प्रगतिशील विचारों की बात होती है, वहीं परिवार नियोजन के मामले में पुरुषों की मानसिकता आज भी पुरानी रूढ़ियों से बंधी हुई है। सरकारी स्वास्थ्य आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली (Delhi family planning) में पुरुष नसबंदी को लेकर सामाजिक हिचकिचाहट बरकरार है, जिसका सीधा बोझ महिलाओं पर पड़ रहा है।
वर्ष 2024-25 के दौरान राजधानी में कुल 14,543 नसबंदी की प्रक्रियाएं हुईं। इन आंकड़ों में चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें से केवल 301 मामलों में ही पुरुषों ने नसबंदी कराई। इसका मतलब है कि कुल नसबंदी में पुरुषों की भागीदारी मात्र 2 प्रतिशत रही, जबकि 98 प्रतिशत मामलों में महिलाओं को ही यह प्रक्रिया अपनानी पड़ी। यह स्थिति पिछले चार वर्षों से लगभग अपरिवर्तित बनी हुई है, जहां पुरुष नसबंदी की हिस्सेदारी कभी भी 3 प्रतिशत से ऊपर नहीं जा सकी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुष नसबंदी (Vasectomy) एक सरल, सुरक्षित और कम जोखिम वाली प्रक्रिया है। यह महिला नसबंदी की तुलना में कहीं कम जटिल मानी जाती है। इसके बावजूद, पुरुषों में यह धारणा गहराई से बैठी है कि नसबंदी कराने से उनकी शारीरिक क्षमता और यौन शक्ति पर नकारात्मक असर पड़ता है। चिकित्सा विज्ञान इस सोच का समर्थन नहीं करता है, लेकिन सामाजिक रूढ़िवादिता के कारण पुरुष इसे अपनी ‘मर्दाना ताकत’ से जोड़कर देखते हैं।
सरकार द्वारा समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए गए हैं और पुरुष नसबंदी को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन भी दिए जाते हैं। हालांकि, दिल्ली में जमीनी स्तर पर इन प्रयासों का असर बेहद सीमित रहा है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि जब तक परिवार नियोजन को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता रहेगा, तब तक यह असंतुलन बना रहेगा। समस्या केवल योजनाओं की नहीं, बल्कि सोच और सामाजिक मानसिकता की है, जिसे बदलना सबसे बड़ी चुनौती है।
