चुनाव आयोग का SC में बयान: चुनावी उद्देश्य से नागरिकता जांच का अधिकार, जानें क्या है पूरा मामला
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण दलील देते हुए कहा है कि उसे चुनावी उद्देश्यों के लिए किसी व्यक्ति की नागरिकता की जांच करने का अधिकार प्राप्त है। आयोग ने यह स्पष्ट किया कि वह मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव संचालन के संबंध में मूल प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो इस संबंध में चुनाव आयोग की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होती है।
आयोग ने यह भी बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (S.I.R.) के दौरान यदि कोई प्रतिकूल निष्कर्ष निकलता है, तो इसका परिणाम केवल मतदाता सूची से संबंधित व्यक्ति का नाम हटाना होगा। यह निर्वासन का कारण नहीं बनेगा। हालांकि, ऐसे मामलों को नागरिकता अधिनियम के तहत आगे की जांच और कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को भेजा जा सकता है।
आयोग ने इस तर्क का खंडन किया कि वह अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर काम कर रहा है। उसने कहा कि नागरिकता कई नियामक ढांचों में एक अनिवार्य शर्त होती है, जैसे कि खनन पट्टों या अन्य वैधानिक लाभों के संबंध में, और सक्षम प्राधिकारी इसकी जांच कर सकता है।
यह दलील प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष दी गई, जो बिहार सहित कई राज्यों में एस.आई.आर. के आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं ने आयोग की शक्तियों के दायरे, नागरिकता और मतदान के अधिकार पर महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए थे।
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि एस.आई.आर. पूरी तरह से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में है और यह एन.आर.सी. जैसी कोई समानांतर नागरिकता-निर्धारण प्रक्रिया नहीं है। उन्होंने बताया कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (E.R.O.) चुनावी उद्देश्यों के लिए सीमित पूछताछ करने में सक्षम है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 146A से 146C का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि संसद ने चुनाव आयोग को दीवानी अदालत के समान शक्तियां प्रदान की हैं।
