कांग्रेस में ‘संगठन’ पर घमासान, रेवंत रेड्डी ने दिग्विजय सिंह को दिया जवाब; Sonia Gandhi की तारीफ कर साधा निशाना
कांग्रेस पार्टी के भीतर संगठन और नेतृत्व को लेकर एक बार फिर से अंदरूनी कलह सामने आई है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के एक बयान पर पलटवार किया है। दिग्विजय सिंह ने RSS और BJP के संगठनात्मक ढांचे की तारीफ की थी, जिसके जवाब में रेड्डी ने सोनिया गांधी के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके कारण ही पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह जैसे नेता प्रधानमंत्री बन सके। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब पार्टी अपनी 140वीं वर्षगांठ मना रही है।
विवाद की शुरुआत दिग्विजय सिंह के X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट से हुई। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक पुरानी तस्वीर साझा की। यह तस्वीर 1996 में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला के शपथ ग्रहण समारोह की थी। तस्वीर में युवा मोदी को भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के पास फर्श पर बैठे हुए दिखाया गया था। सिंह ने इस तस्वीर को साझा करते हुए लिखा, “यह तस्वीर बहुत प्रभावशाली है। कैसे एक RSS स्वयंसेवक और जनसंघ/भाजपा कार्यकर्ता, जो कभी नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठता था, वह एक राज्य का मुख्यमंत्री और देश का प्रधानमंत्री बन गया। यही संगठन की शक्ति है। जय सिया राम।”
दिग्विजय सिंह के इस पोस्ट को कांग्रेस के भीतर कई नेताओं ने RSS और BJP की प्रशंसा के रूप में देखा। इसके तुरंत बाद रेवंत रेड्डी ने सोनिया गांधी की प्रशंसा करते हुए एक पोस्ट किया। रेड्डी ने लिखा, “श्रीमतीसरे मोर्चे के नेता के रूप में सोनिया गांधी जी के नेतृत्व में ही यह संभव हुआ कि तेलंगाना के एक दूरदराज के गांव से अपना सार्वजनिक करियर शुरू करने वाले श्री पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने।” उन्होंने आगे कहा, “श्रीमती सोनिया गांधी जी ने ही डॉ मनमोहन सिंह जी जैसे अर्थशास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया।” रेड्डी का यह बयान स्पष्ट रूप से दिग्विजय सिंह के बयान का खंडन था।
इस विवाद पर पार्टी के भीतर अन्य नेताओं की भी प्रतिक्रियाएं आईं। शशि थरूर ने दिग्विजय सिंह का समर्थन करते हुए कहा कि संगठन को मजबूत करने की जरूरत है। वहीं, कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने RSS की तुलना अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठन से कर दी। उन्होंने कहा कि RSS नफरत फैलाता है और उससे सीखने के लिए कुछ नहीं है। यह घटनाक्रम कांग्रेस के भीतर दो अलग-अलग विचारों को दर्शाता है: एक धड़ा संगठनात्मक सुधार की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा गांधी परिवार के नेतृत्व और यथास्थिति का समर्थन करता है।
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