समान नागरिक संहिता पर गुजरात हाईकोर्ट का फैसला: याचिका खारिज, कार्यपालिका के अधिकार पर मुहर
गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की आवश्यकता का मूल्यांकन करने के लिए गठित समिति को चुनौती देने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि ऐसी समिति का गठन कार्यपालिका का विशेषाधिकार है और न्यायपालिका इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि यूसीसी पैनल का गठन संविधान के अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य सरकार की कार्यपालिका शक्ति के तहत लिया गया एक ‘शुद्ध नीतिगत निर्णय’ है। इसलिए, यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है। खंडपीठ ने सत्ता के पृथक्करण के सिद्धांत का कड़ाई से पालन करने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का दायरा उन क्षेत्रों में प्रवेश की अनुमति नहीं देता जो संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत कार्यपालिका के विशेष अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
इससे पहले, इसी मामले में एक एकल पीठ ने भी जुलाई 2025 में राज्य के लिए यूसीसी की आवश्यकता पर विचार करने के लिए गठित समिति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि राज्य सरकार ने यूसीसी के मामले में बिना किसी पूर्व अधिसूचना के ही समिति की घोषणा कर दी थी, जो कि नियमों के अनुसार नहीं है।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा का अधिकार केवल तभी लागू होता है जब कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहे या अपने अधिकारों का अतिक्रमण करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मामला पूरी तरह से एक नीतिगत निर्णय का है, जिसमें अदालत का दखल देना उचित नहीं है। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि यूसीसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार सरकार के पास सुरक्षित है और न्यायपालिका इसमें सीमित भूमिका निभाएगी।
