10 साल बाद गैस सिलेंडर ब्लास्ट मामले में दो आरोपी बरी, सबूतों की कमी बनी वजह
चंडीगढ़ की जिला अदालत ने करीब दस साल पहले गांव फैदां में हुए एक बड़े गैस सिलेंडर ब्लास्ट मामले में दो आरोपियों संजय शाह और लालू शाह को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि पुलिस मामले में आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश करने में नाकाम रही। इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि धमाके में घायल हुए लोग और मुख्य शिकायतकर्ता भी गवाही देने के लिए अदालत में हाजिर नहीं हुए, जिससे अभियोजन पक्ष के लिए आरोप साबित करना और भी मुश्किल हो गया।nnयह घटना आठ दिसंबर 2015 की शाम को हुई थी, जब गांव फैदां में एक घर में रखे गैस सिलेंडरों में भीषण धमाका हुआ था। सूत्रों के अनुसार, उस समय घर को अवैध रूप से गैस सिलेंडरों के स्टोर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था। इस धमाके के कारण लगी आग में घर के कई सदस्य घायल हो गए थे, जिनमें शिकायतकर्ता बबलू शाह की पत्नी संगीता, बेटी मुस्कान और तीन बेटे मुन्ना, राहुल और विशाल शामिल थे। घटना के बाद मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड और आपदा प्रबंधन टीमों ने आग पर काबू पाया था और पुलिस ने मौके से बड़ी संख्या में अवैध रूप से रखे गैस सिलेंडर भी बरामद किए थे।nnपुलिस ने इस मामले में बबलू शाह के बयान के आधार पर संजय शाह और लालू शाह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, जिनमें गैर इरादतन हत्या का प्रयास (336), लापरवाही से चोट पहुंचाना (337), और गंभीर चोट पहुंचाना (338) के साथ-साथ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि, जब मामला अदालत पहुंचा, तो पुलिस आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सकी।nnअभियोजन पक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि शिकायतकर्ता बबलू शाह और हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई उनकी पत्नी संगीता, जिन्हें इस मामले में मुख्य गवाह माना जा रहा था, कई मौकों के बावजूद अदालत में पेश नहीं हुए। इसके अतिरिक्त, इस घटना में किसी भी स्वतंत्र गवाह या प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों के खिलाफ गवाही नहीं दी।nnअदालत ने इन सभी परिस्थितियों पर गौर करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह स्थापित करने में विफल रहा कि धमाके के लिए वास्तव में आरोपी ही जिम्मेदार थे। आरोपियों की पहचान और घटना में उनकी भूमिका को लेकर पर्याप्त सबूतों के अभाव में, अदालत ने उन्हें भारतीय कानून के तहत संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।”
nnयह फैसला इस बात पर प्रकाश डालता है कि किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए पुख्ता सबूत और गवाहों की उपस्थिति कितनी महत्वपूर्ण होती है। गवाहों के सहयोग के बिना, भले ही आरोप गंभीर हों, न्याय प्रक्रिया को पूरा करना और दोषियों को सजा दिलाना असंभव हो जाता है।
