यूपी में 6 लघु जल विद्युत परियोजनाएं होंगी लीज पर, इंजीनियरों का विरोध, UP power projects पर विवाद
उत्तर प्रदेश में छह लघु जल विद्युत परियोजनाओं को निजी क्षेत्र को 42 साल की लंबी लीज पर दिए जाने का प्रस्ताव सामने आया है। राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने इसके लिए टेंडर जारी कर दिया है, जिसकी प्री-बिड मीटिंग 3 मार्च को निर्धारित है। इस निर्णय का ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) सहित अन्य इंजीनियरों के संगठनों ने कड़ा विरोध किया है, जिससे राज्य की ऊर्जा नीति और सार्वजनिक संपत्तियों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं। यह कदम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन क्षेत्रों में स्थित लगभग 90 से 97 साल पुरानी परियोजनाओं को प्रभावित करेगा, जो ऊपरी गंगा नहर पर स्थित हैं।
परियोजनाओं के लीज पर दिए जाने का विरोध
इंजीनियरों के संगठन ने टेंडर की शर्तों पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनके अनुसार, निजी कंपनियों को 1.5 करोड़ रुपये प्रति मेगावॉट के अग्रिम प्रीमियम पर इन परियोजनाओं का संचालन नियंत्रण 42 वर्षों के लिए दिया जाएगा। इन छह परियोजनाओं में भोला (2.7 मेगावॉट), सलावा (3 मेगावॉट), निर्गजनी (5 मेगावॉट), चित्तौरा (3 मेगावॉट), पलरा (0.6 मेगावॉट) और सुमेरा (1.5 मेगावॉट) शामिल हैं। विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि टेंडर में परियोजनाओं की कुल स्थापित क्षमता 15.5 मेगावॉट के बजाय 6.3 मेगावॉट दिखाई गई है। इसी आधार पर लगभग 10 करोड़ रुपये में राज्य की मूल्यवान परिसंपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है, जो कि वास्तविक मूल्य से काफी कम है।
भूमि के व्यावसायिक उपयोग की आशंका
इंजीनियरों ने आशंका व्यक्त की है कि 42 वर्षों की लंबी लीज अवधि के दौरान निजी कंपनियां न केवल विद्युत उत्पादन से लाभ कमाएंगी, बल्कि इन परियोजनाओं से जुड़ी पर्याप्त भूमि का व्यावसायिक उपयोग भी कर सकती हैं। ये परियोजनाएं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन क्षेत्रों में स्थित हैं जहां भूमि का मूल्य बहुत अधिक है। इतनी लंबी अवधि के बाद परिसंपत्तियों की मूल स्थिति में वापसी भी संदिग्ध रहेगी, जिससे राज्य को बड़ा नुकसान हो सकता है।
आधुनिकीकरण का विकल्प और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
विरोध कर रहे इंजीनियरों का तर्क है कि इन परियोजनाओं का आधुनिकीकरण सरकारी क्षेत्र में ही किया जा सकता है। चूंकि सभी परियोजनाएं ऊपरी गंगा नहर पर हैं, इसलिए साल भर पानी की उपलब्धता के कारण पूरे वर्ष विद्युत उत्पादन संभव है। उनका सुझाव है कि यदि सीमित निवेश किया जाए तो परियोजनाओं का आधुनिकीकरण किया जा सकता है और इस खर्च को एक साल के भीतर ही विद्युत उत्पादन से वसूला जा सकता है। फेडरेशन ने पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन पर निजीकरण को बढ़ावा देने और राज्य की सार्वजनिक संपत्तियों को औने-पौने दाम पर हस्तांतरित करने का आरोप लगाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और टेंडर को रद्द करने की मांग की है, ताकि सार्वजनिक संपत्तियों और जनहित की रक्षा हो सके।
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