‘1 रुपये की उड़ान’ का सपना तोड़ने वाला कौन? इंडिगो की पैरेंट कंपनी पर लगा था ‘साजिश’ का आरोप
क्या आपको ‘एयर डेक्कन चैलेंज’ याद है? वह विज्ञापन जिसमें 1 रुपये में उड़ान भरने का वादा किया गया था। 2000 के दशक की शुरुआत में, जब भारतीय आसमान पर एयर इंडिया, जेट एयरवेज और किंगफिशर जैसी फुल-सर्विस एयरलाइंस का राज था, तब कैप्टन जीआर गोपीनाथ ने भारत की पहली कम लागत वाली एयरलाइन एयर डेक्कन शुरू करने की हिम्मत दिखाई।
गोपीनाथ ने आयरिश एयरलाइन Ryanair से प्रेरणा ली और ‘आम आदमी को उड़ान भरने’ का सपना देखा। लेकिन 2003 में शुरू हुई यह यात्रा 2008 में किंगफिशर को बेचने के साथ खत्म हो गई। गोपीनाथ ने बाद में आरोप लगाया कि इंडिगो की पैरेंट कंपनी इंटरग्लोब एविएशन ने एयर डेक्कन को ‘तोड़फोड़’ किया। उनका दावा था कि इंटरग्लोब द्वारा बनाए गए आईटी सिस्टम में बार-बार खराबी आई, जिससे एयर डेक्कन के यात्री इंडिगो की ओर चले गए। गोपीनाथ के अनुसार, यह ‘ऊंट की पीठ तोड़ने वाली आखिरी तिनका’ साबित हुआ।
दशकों बाद, जब भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो में बड़े पैमाने पर उड़ानें रद्द हो रही हैं, जिससे लाखों यात्रियों की योजनाएं अधर में लटक गई हैं, तो एयर डेक्कन की कहानी और गोपीनाथ के आरोप प्रासंगिक हो जाते हैं। गोपीनाथ के आरोप एक बार फिर सुर्खियों में हैं, खासकर जब इंडिगो पर डीजीसीए के नए उड़ान-ड्यूटी नियमों को लेकर केंद्र पर दबाव बनाने के लिए मौजूदा अव्यवस्था पैदा करने का आरोप लग रहा है।
यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि कैसे एक सेना के अनुभवी, कैप्टन गोपीनाथ ने 28 साल की उम्र में सेना से रिटायर होने के बाद एयर डेक्कन का सपना देखा। उन्होंने भारतीय विमानन को किफायती उड़ान के युग में खींच लिया, जिसकी शुरुआत 1 रुपये के टिकट से हुई थी। लेकिन यह सपना कैसे बिखर गया? क्या इंटरग्लोब एविएशन की कथित तोड़फोड़ एकमात्र कारण थी, या इसने एयर डेक्कन को गिराने वाली अन्य बाधाओं को बढ़ा दिया?
आज इंडिगो भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन है, जिसके पास लगभग 65% घरेलू बाजार हिस्सेदारी है। लेकिन गोपीनाथ की कहानी हमें याद दिलाती है कि कैसे बाजार में प्रतिस्पर्धा और कॉर्पोरेट रणनीति ने एक pioneering सपने को कुचल दिया।
