मलिनषोडशी क्रिया क्या है और क्या छोटे बच्चों का किया जाता है श्राद्ध | religion news
पितृपक्ष के पवित्र पखवाड़े में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य करते हैं। इस दौरान कई बार परिवारों के मन में यह असमंजस रहता है कि क्या कम उम्र में दुनिया छोड़ने वाले बच्चों का भी श्राद्ध किया जाना चाहिए या नहीं। सनातन संस्कृति और गरुड़ पुराण में इस विषय पर स्पष्ट नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना आवश्यक माना गया है।
उम्र के हिसाब से क्या हैं नियम
गरुड़ पुराण के अनुसार, बच्चों के श्राद्ध और संस्कार का निर्धारण उनकी आयु के आधार पर तीन श्रेणियों में किया जाता है। यदि गर्भावस्था के दौरान ही संतान की मृत्यु हो जाए या जन्म के बाद दो वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही किसी बच्चे का निधन हो जाए, तो पारंपरिक श्राद्ध और पिंडदान नहीं किया जाता है। वहीं, दो वर्ष से अधिक और छह वर्ष तक की आयु वाले बच्चों के लिए पारंपरिक श्राद्ध की बजाय विशेष संस्कारों का विधान है। छह वर्ष की आयु पूरी होने के बाद ही पूर्ण रूप से पिंडदान और अन्य वार्षिक श्राद्ध क्रियाएं की जाती हैं।
क्या है मलिनषोडशी क्रिया
दो से छह वर्ष की आयु के बच्चों की मृत्यु होने पर मलिनषोडशी क्रिया की जाती है। यह प्रक्रिया लगभग दस दिनों तक चलती है, जिसे दशगात्र भी कहा जाता है। इसमें बच्चे को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने और आत्मा की शांति के लिए कुल 16 पिंड अर्पित किए जाते हैं। मृत्यु के समय से लेकर श्मशान यात्रा और अस्थि संचय तक कुल छह पिंड अर्पित किए जाते हैं, जिसके बाद दशगात्र क्रिया के तहत अगले दस दिनों तक रोजाना एक-एक पिंड अर्पित करने की परंपरा है। यह पिंड जौ या चावल के आटे, काले तिल, दूध, घी और शहद के मिश्रण से तैयार किए जाते हैं। इस विधान से शोक संतप्त परिवार को मानसिक संबल और मृत आत्मा को शांति मिलने की मान्यता है।
