बच्चों में बढ़ रहा वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा, Doctors ने दी चेतावनी; स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह
भारत में बच्चों के बीच मोबाइल और डिजिटल उपकरणों का बढ़ता उपयोग उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। कम उम्र में स्मार्टफोन की लत, घंटों तक स्क्रीन के सामने समय बिताना और शारीरिक गतिविधियों की कमी बच्चों के मानसिक विकास, व्यवहार और सीखने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाल रही है। यह स्थिति परिवारों और समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बन रही है, जिससे बच्चों का बचपन रील्स की दुनिया में खोता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार मोबाइल देखने से बच्चों की एकाग्रता कमजोर हो रही है। रील्स और शॉर्ट वीडियो की आदत के कारण बच्चे 15-20 सेकंड से अधिक किसी एक चीज़ पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उन्हें किताबें और पढ़ाई उबाऊ लगने लगी है। देश भर के अस्पतालों की ओपीडी में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ बच्चे छोटी उम्र में ही मोबाइल पर अत्यधिक निर्भर हो गए हैं और बिना मोबाइल के खाना तक नहीं खाते।
मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अभिनव शेखर बताते हैं कि हर महीने लगभग 30 से अधिक मामले वर्चुअल ऑटिज्म के सामने आ रहे हैं। इनमें अधिकतर ऐसे बच्चे होते हैं जो स्क्रीन पर आने वाली रील्स या कार्टून का मतलब भी नहीं समझते। यह स्थिति बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, जिससे वे वास्तविक दुनिया से कटते जा रहे हैं।
Doctors की सलाह है कि नवजात और पांच साल से छोटे बच्चों को फोन से पूरी तरह दूर रखा जाए। पांच से आठ साल तक के बच्चों को आवश्यक होने पर अभिभावक अपनी निगरानी में ही टीवी या टैबलेट स्क्रीन दिखाएं। 10 साल से ऊपर के बच्चों को भी केवल आवश्यक होने पर ही टैबलेट उपलब्ध कराया जाना चाहिए। मोबाइल की लत से बचाने के लिए अभिभावकों को स्वयं भी स्क्रीन से दूरी बनानी चाहिए और बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना चाहिए ताकि उनका समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।
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