टाटा स्टील को मिली कोयला खोजने की शक्ति, केंद्र सरकार के फैसले से खनन प्रक्रिया होगी तेज
टाटा स्टील के लिए यह एक बड़ी और राहत भरी खबर है। केंद्र सरकार ने कंपनी की नेचुरल रिसोर्सेज डिवीजन को कोयला और लिग्नाइट की खोज (सर्वेक्षण) करने के लिए आधिकारिक तौर पर मान्यता दे दी है।
अब टाटा स्टील को कोयले के भंडार खोजने के लिए बार-बार सरकारी प्रोस्पेक्टिंग लाइसेंस का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सरकार के इस फैसले से खनन प्रक्रिया शुरू करने में लगने वाले समय में करीब छह महीने की कमी आएगी, जिससे न केवल टाटा स्टील बल्कि देश की ऊर्जा जरूरतें भी तेजी से पूरी हो सकेंगी।
कोयला मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में टाटा स्टील (पूर्वी सिंहभूम) समेत निजी क्षेत्र की कुल 18 एजेंसियों को यह अधिकार सौंपा है। ये सभी एजेंसियां क्वालिटी काउंसिल आफ इंडिया से मान्यता प्राप्त हैं।
टाटा स्टील अपनी उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ा रही है। कंपनी का लक्ष्य 2030 तक अपनी क्षमता को 40 मिलियन टन सालाना तक ले जाने का है। इतनी विशाल क्षमता के लिए निर्बाध कोयले और लौह अयस्क की आपूर्ति सबसे बड़ी चुनौती है।
वर्तमान में टाटा स्टील के पास नोवामुंडी, झरिया और वेस्ट बोकारो में प्रमुख कोयला खदानें हैं, जो कंपनी की लाइफलाइन हैं। एमएमडीआर एक्ट में हुए संशोधनों के तहत देश में कई कैप्टिव माइंस की लीज अवधि 2030 तक सुनिश्चित की गई थी।
ऐसे में, भविष्य की जरूरतों और लीज की समयसीमा को देखते हुए नए भंडारों की खोज करना कंपनी के लिए अनिवार्य है। अब प्रोस्पेक्टिंग एजेंसी का दर्जा मिलने से टाटा स्टील को यह रणनीतिक लाभ मिलेगा कि वह नए कोल ब्लॉक्स में छिपे खनिजों का पता खुद लगा सकेगी। इससे कंपनी की रा मटेरियल सिक्योरिटी (कच्चे माल की सुरक्षा) बेहद मजबूत होगी।
पहले निजी कंपनियों को किसी भी क्षेत्र में खनिज खोजने के लिए सरकार से हर बार अलग से अनुमति और लाइसेंस लेना पड़ता था। यह प्रक्रिया बेहद जटिल और लंबी थी।
अब एमएमडीआर अधिनियम, 1957 की धारा 4 के तहत इन मान्यता प्राप्त एजेंसियों को अधिकृत कर दिया गया है। इससे कोल ब्लाक पाने वाली कंपनियों (अलाटी) को यह आजादी होगी कि वे सरकारी एजेंसियों पर निर्भर रहने के बजाय टाटा स्टील जैसी सक्षम निजी एजेंसियों से भी सर्वे करा सकें।
