आतंक पर ‘शरारत’ वाले बयानों को शुरुआत में ही कुचलना होगा
भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में, जहाँ अनेक धार्मिक, जातीय और सामाजिक समूहों में असंतोष मौजूद हो सकता है, लाल किले के निकट हुए आतंकी हमले की स्पष्ट और बिना हिचकिचाहट के निंदा न करना बेहद चिंताजनक है। कुछ ऐसे नेता, जो स्वयं को पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक जीवन-शैली का समर्थक बताते हैं, वे मुसलमानों के बीच तथाकथित “असंतोष” को लेकर शरारत भरे तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि हम अपने संविधान और लोकतंत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो दोहरी जबान बोलने वाले, “अगर” और “लेकिन” का सहारा लेकर सतही-शरारती तर्क गढ़ने वाले सभी नेताओं को आईना दिखाया जाना चाहिए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम जैसे नेताओं का यह कहना कि पहलगाम और लाल किले पर हमले करने वाले “घरेलू” आतंकी थे, राजनीति प्रेरित सिद्धांत देकर भ्रम फैलाने का प्रयास है। लाल किला विस्फोट के बाद चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर यह सिद्धांत उछाला कि आतंकियों के दो प्रकार होते हैं-विदेशी प्रशिक्षित घुसपैठिए और घरेलू आतंकी। इससे भी अधिक चिंताजनक बात उन्होंने यह कही कि हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो भारतीय नागरिकों और यहां तक कि शिक्षित लोगों को आतंकी बना देती हैं। ऐसे नेताओं को समझना चाहिए कि उनकी ही राजनीति भारतीय नागरिकों को आतंकी बनने की ओर धकेलती है। उनकी तुष्टीकरण की राजनीति ने देश को विभाजित किया और 1940 के दशक में पाकिस्तान के निर्माण की राह बनाई। यही राजनीति आतंक की राह पर चलने वाले मुसलमानों में पीड़ित होने की भावना को बढ़ावा देती है।
यह नेता यह मिथ्या दावा भी करते हैं कि भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। चिदंबरम और उनके जैसे नेताओं को याद रखना चाहिए कि 1940 के दशक में भारत के मुसलमानों ने एक अलग देश की मांग की थी, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान का जन्म हुआ। उस समय शेष भारत की 88 प्रतिशत आबादी हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध जैसे वैदिक/भारतीय धर्मों के अनुयायियों की थी और उन्होंने तय किया कि भारत एक पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य होगा। स्वतंत्रता के समय 3.5 करोड़ मुसलमान भारत में ही रहे, जिनकी आबादी आज बढ़कर करीब 20 करोड़ हो गई है। यह आज़ादी के बाद से पांच गुना वृद्धि है, जो सभी धार्मिक समूहों में सबसे अधिक है। यदि उनके साथ अत्याचार हो रहा होता तो क्या उनकी आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ पाती? देश भर में मुस्लिम सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थानों, मदरसों और मस्जिदों का व्यापक विस्तार हुआ है। एक मज़बूत मुस्लिम मध्यवर्ग उभरकर आया है और मुस्लिम युवा नौकरशाही, शिक्षा, मीडिया, कारपोरेट प्रबंधन, कला और खेल जैसे सभी क्षेत्रों में अपना नाम रोशन कर रहे हैं। बालीवुड खानों द्वारा संचालित है, और महान वैज्ञानिक डा. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे व्यक्तित्वों का योगदान पूरे देश में श्रद्धा से याद किया जाता है।
स्वतंत्रता के बाद तीन राष्ट्रपति और एक कार्यवाहक राष्ट्रपति मुस्लिम रहे हैं। अब तक छह मुस्लिम भारत रत्न से सम्मानित हो चुके हैं। इसके अलावा, संविधान में निहित सभी मौलिक अधिकार उन्हें प्राप्त हैं, जो उन्हें अपना मजहब मानने, पालन करने और प्रचार करने, अपने मजहबी स्थानों का निर्माण और संचालन करने, तथा अपने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों का निर्माण और संचालन करने की गारंटी देते हैं। ऐसे में, आतंकी हमलों पर राजनीति करना राष्ट्र के लिए अत्यंत हानिकारक है।
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