बच्चों में बढ़ रहा भेंगापन: KGMU में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े, ‘Screen Time’ बन रहा कारण
लखनऊ: मोबाइल और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ता ‘Screen Time’ बच्चों की आंखों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के नेत्र रोग विभाग में भेंगापन (squint) से पीड़ित बच्चों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की गई है, जिसके पीछे मुख्य कारण स्क्रीन पर बिताया गया लंबा समय है। यह स्थिति बच्चों के भविष्य की दृष्टि और समग्र स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकती है।
कोविड-19 महामारी के बाद से KGMU की ओपीडी में भेंगापन की शिकायत लेकर आने वाले बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां दो-तीन महीने में एक-दो मामले आते थे, वहीं अब हर महीने 10 से 15 बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इनमें से कई बच्चों को गंभीर स्थिति में पहुंचने के कारण ऑपरेशन की भी जरूरत पड़ रही है।
स्क्रीन टाइम और आंखों पर असर
नेत्र रोग विशेषज्ञों के अनुसार, पांच से 15 साल की उम्र के बच्चों में यह समस्या अधिक देखी जा रही है। लंबे समय तक स्क्रीन पर लगातार ध्यान केंद्रित करने से आंखों की मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे दोनों आंखों के बीच तालमेल बिगड़ जाता है, जो अंततः भेंगापन का रूप ले लेता है। ऑनलाइन पढ़ाई, गेमिंग और वीडियो देखने की अत्यधिक आदत ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। दिन में चार से छह घंटे तक स्क्रीन पर समय बिताने से कम उम्र में आंखों की मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं, जिससे अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर हानिकारक साबित हो रहा है।
बचाव और जागरूकता है जरूरी
KGMU के नेत्र रोग विभाग के डॉक्टरों ने अभिभावकों को बच्चों के स्क्रीन उपयोग के प्रति जागरूक रहने की सलाह दी है। नई गाइडलाइन के अनुसार, तीन वर्ष से छोटे बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर रखना चाहिए, जबकि तीन से पांच साल के बच्चों के लिए अधिकतम आधे घंटे का स्क्रीन टाइम निर्धारित किया जा सकता है। समय रहते भेंगापन के लक्षणों को पहचानना और उचित उपचार कराना महत्वपूर्ण है, जिसमें चश्मे का उपयोग, आंखों के व्यायाम और कुछ मामलों में सर्जरी भी शामिल हो सकती है। अभिभावकों को बच्चों की आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए और नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए ताकि इस गंभीर समस्या से बचा जा सके।
