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श्रीकृष्ण ने क्यों नहीं खेला शकुनि के साथ चौसर? महाभारत की अनसुनी कथा

By Nov 18, 2025

महाभारत की कथाओं में चौसर का खेल एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसके कारण युधिष्ठिर को अपनी सारी संपत्ति, भाइयों और यहाँ तक कि पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगाना पड़ा। इस खेल में हार के परिणामस्वरूप पांडवों को 12 साल का वनवास और एक साल का अज्ञातवास झेलना पड़ा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर भगवान श्रीकृष्ण ने इस खेल में हिस्सा लिया होता, तो क्या होता?

यह सर्वविदित है कि शकुनि के पासे अत्यंत मायावी थे और वे उसके इशारों पर चलते थे। ऐसी मान्यता है कि केवल भगवान श्रीकृष्ण ही शकुनि को इस खेल में परास्त कर सकते थे। हालांकि, जब पांडवों और कौरवों के बीच यह निर्णायक खेल खेला जा रहा था, तब भगवान श्रीकृष्ण वहां उपस्थित नहीं थे। लेकिन महाभारत ग्रंथ में एक ऐसी कथा भी मिलती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा शकुनि के साथ चौसर खेलने का वर्णन है।

कुरुक्षेत्र के युद्ध के मध्यकाल में, जब कौरवों की सेना पांडवों के हाथों भारी क्षति झेल रही थी और उनके कई योद्धा मारे जा चुके थे, तब शकुनि ने एक चाल चली। उसने भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध समाप्त होने के बाद, सूर्यास्त के पश्चात, अपने शिविर में चौसर खेलने के लिए आमंत्रित किया। शकुनि ने एक शर्त रखी: यदि वह खेल जीतता है, तो युद्ध समाप्त हो जाएगा और पांडवों को उनका राज्य वापस मिल जाएगा। यदि श्रीकृष्ण जीतते हैं, तो युद्ध जारी रहेगा।

खेल शुरू हुआ और शकुनि ने अपनी चाल चली। लेकिन श्रीकृष्ण अपनी चालें शकुनि को ही देते रहे। जब शकुनि ने श्रीकृष्ण से अपनी चाल चलने को कहा, तो उन्होंने पासे अपने हाथ में लिए। जैसे ही श्रीकृष्ण ने पासे उठाए, वे राख बनकर बिखर गए। शकुनि यह देखकर हैरान रह गया और उसने इसका कारण पूछा।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने शकुनि को समझाया कि ये पासे नकारात्मकता और कपट से भरे थे, और उनकी दिव्यता के स्पर्श मात्र से वे नष्ट हो गए। उन्होंने कहा कि यदि युधिष्ठिर की जगह उन्होंने यह खेल खेला होता, तो यह युद्ध कभी नहीं होता, क्योंकि वह शकुनि की चालों को जानते थे और आसानी से जीत जाते। लेकिन पांडवों की यह इच्छा थी कि श्रीकृष्ण इस खेल में शामिल न हों, और वे स्वयं भी नहीं चाहते थे कि उनकी उपस्थिति से पांडवों को कोई अनुचित लाभ मिले। इसलिए, उन्होंने खेल में भाग न लेने का निर्णय लिया, ताकि सत्य और धर्म की विजय अंततः स्वयं पांडवों के कर्मों से ही हो।

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