शोले का बदला क्लाइमेक्स: सेंसरशिप के कारण क्यों बदली गई थी वो क्रूर पटकथा?
भारतीय सिनेमा की कल्ट क्लासिक ‘शोले’ को 12 दिसंबर को 4K में फिर से रिलीज किया जा रहा है। धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, हेमा मालिनी, संजीव कुमार और अमजद खान जैसे दिग्गजों से सजी इस फिल्म के गाने और डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘शोले’ का अंत जैसा हमने देखा, वैसा मूल रूप से लिखा ही नहीं गया था?
फिल्म के सह-लेखक जावेद अख्तर के बेटे फरहान अख्तर के अनुसार, ‘शोले’ का एक ऐसा क्लाइमेक्स था जो आज की तुलना में कहीं अधिक क्रूर और खूंखार था। यह मूल क्लाइमेक्स फिल्म की रिलीज के 45 साल बाद सामने आया है, और इसके पीछे का कारण उस समय के कड़े सेंसरशिप नियम थे।
मूल पटकथा में, संजीव कुमार द्वारा निभाया गया ठाकुर का किरदार गब्बर सिंह को अपने जूतों से कुचलकर मार डालता। यह वह दृश्य था जो फिल्म के बदले हुए अंत से काफी अलग था। 1975 में, जब देश में आपातकाल का माहौल था, सेंसर बोर्ड ने इस मूल अंत को ‘अत्यधिक हिंसक’ करार दिया। परिणामस्वरूप, फिल्म निर्माताओं को एक नया, कम हिंसक अंत फिल्माना पड़ा, जिसमें गब्बर सिंह को पुलिस द्वारा गिरफ्तार दिखाया गया।
फरहान अख्तर बताते हैं कि लेखकों, सलीम खान और जावेद अख्तर, के पास सेंसर बोर्ड की मांगों को मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। हालांकि वे मानते थे कि फिल्म का भावनात्मक मूल गब्बर से बदला लेने की कहानी में निहित था, जहां एक अपंग ठाकुर अपने दुख से प्रेरित होकर गब्बर को अपने जूतों के स्पाइक्स से कुचल देता है।
उन्होंने यह भी बताया कि यह बदला हुआ अंत पटकथा के प्रवाह के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता था, खासकर जब फिल्म के अंतिम क्षणों में लोग और पुलिस मौजूद थे। निर्देशक रमेश सिप्पी ने भी बाद के साक्षात्कारों में स्वीकार किया था कि उन्होंने अधिक नाटकीय अंत फिल्माया तो था, लेकिन सेंसर बोर्ड के निर्देशों का पालन करने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ा।
