सुविधाएं हैं, पर डॉक्टर नहीं: दरभंगा के सीएचसी में इलाज अधूरा
दरभंगा के केवटी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में सुविधाओं का अंबार लगा है, लेकिन चिकित्सकों और आवश्यक कर्मियों की कमी के कारण मरीजों को इलाज अधूरा ही मिल पा रहा है। वर्ष 2012 में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को अपग्रेड कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का दर्जा दिया गया और 2015 से नए भवन में मरीजों का इलाज शुरू हुआ। पीएचसी से सीएचसी बनने तक, यानी करीब एक दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी जस की तस बनी हुई है।
यह केंद्र 30 बेड का है और प्रखंड की लगभग चार लाख की आबादी इसी पर निर्भर है। इसके अलावा, सीमावर्ती मधुबनी जिले के बिस्फी और दरभंगा जिले के सदर प्रखंड की कई पंचायतों के लोग भी करीब 20 से 25 किलोमीटर की दूरी तय करके यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। लेकिन डॉक्टरों की कमी के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। विशेष रूप से स्त्री रोग विशेषज्ञ महिला चिकित्सक की अनुपस्थिति में प्रसव कक्ष रात में स्टाफ नर्सों और एएनएम के भरोसे रहता है, जो गंभीर परिस्थितियों में जानलेवा साबित हो सकता है।
केंद्र पर यक्ष्मा, शुगर, ब्लड ग्रुपिंग, हिमोग्लोबिन, एचआईवी, हेपेटाइटिस बी व सी, सिफलिस, मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड आदि जांचों की सुविधा उपलब्ध है। औसतन प्रतिदिन 100 से 150 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। गंभीर मामलों में मरीजों को दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (डीएमसीएच) रेफर किया जाता है। जेनरेटर चलाने के लिए भी नियमित ऑपरेटर नहीं है, जिसका जिम्मा सुरक्षा गार्ड उठा रहे हैं।
स्वीकृत 61 पदों में से लगभग आधे से अधिक पद खाली हैं। प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी का पद भी रिक्त है, जिसकी अतिरिक्त जिम्मेदारी पास के पीएचसी के प्रभारी को सौंपी गई है। विशेषज्ञ चिकित्सकों के छह पदों में से केवल दो, सामान्य चिकित्सकों के छह में से तीन, स्टाफ नर्स के 16 में से चार, लैब टेक्नीशियन के चार में से चार, लिपिक के चार में से एक और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के पांच में से तीन पद ही भरे हुए हैं। ड्रेसर सह कंपाउंडर के पद खाली होने से संबंधित कार्य चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों से कराया जा रहा है।
सीएचसी के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. निर्मल कुमार लाल ने स्वीकार किया है कि सीएचसी में चिकित्सकों और कर्मियों की कमी है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध संसाधनों से बेहतर इलाज देने का प्रयास किया जाता है और 24 घंटे तैनाती रहती है। दुर्घटनाग्रस्त मरीजों का भी बेहतर इलाज होता है। इस कमी को दूर करने के लिए वरीय अधिकारियों को पत्र लिखा गया है। लेकिन कब तक यह समस्या हल होगी, यह कहना मुश्किल है। डॉक्टरों की कमी के कारण इस स्वास्थ्य केंद्र का नाम ‘सुविधाएं हैं, पर डॉक्टर नहीं’ के रूप में जाना जाने लगा है।
