संसद में वंदे मातरम् पर होगी विशेष चर्चा, प्रधानमंत्री भी रखेंगे पक्ष
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक विशेष चर्चा का आयोजन किया जाएगा। लोकसभा में इस महत्वपूर्ण विषय पर गुरुवार या शुक्रवार को लगभग दस घंटे तक विचार-विमर्श के लिए आवंटित किए गए हैं। इस अवसर को राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरक धरोहर को स्मरण करने के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, यह उम्मीद जताई जा रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस दस घंटे की लंबी बहस में भाग लेकर राष्ट्रगीत की ऐतिहासिक यात्रा और उसके सांस्कृतिक महत्व पर अपने विचार रखेंगे। सरकार ने लोकसभा की कार्यमंत्रणा समिति की बैठक में एसआईआर (SIR) पर चर्चा की विपक्ष की मांग को फिलहाल स्वीकार नहीं किया है, लेकिन इसके बजाय वंदे मातरम् पर चर्चा का प्रस्ताव दिया है, जिसे राष्ट्रीय स्मृति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया गया है।
दूसरी ओर, कांग्रेस ने एसआईआर और चुनावी सुधारों पर एक व्यापक बहस की अपनी मांग दोहराई है। कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार वंदे मातरम् पर चर्चा की आड़ में मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने इस विशेष चर्चा का समर्थन करते हुए कहा है कि राष्ट्रगीत पर बहस संसद के लिए गौरव का विषय होना चाहिए।
वंदे मातरम् पर यह संसदीय विमर्श ऐसे समय में हो रहा है जब केंद्र सरकार इसकी 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों की श्रृंखला आयोजित कर रही है। इसी महीने दिल्ली में संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने इन समारोहों का औपचारिक शुभारंभ किया था। इस दौरान उन्होंने 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा मूल गीत के कुछ पद हटाए जाने की घटना की आलोचना भी की थी।
प्रधानमंत्री के इस बयान पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री इतिहास को तोड़-मरोड़ रहे हैं और उन्होंने कांग्रेस तथा रवींद्रनाथ टैगोर दोनों का अपमान किया है। राष्ट्रगीत की पृष्ठभूमि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से गहराई से जुड़ी हुई है। बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे 1870 के दशक में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में रचा था। 7 नवंबर 1875 को ‘बंगदर्शन’ पत्रिका में इसका प्रकाशन हुआ और बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। 1950 में संविधान लागू होने पर इसे औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत विदेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध और राष्ट्रीय चेतना का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया था।
केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत की वर्षगांठ के अवसर पर एक स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट भी जारी किया है। संसद में प्रस्तावित यह विमर्श न केवल राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक अध्याय को नए सिरे से समझने का अवसर प्रदान करेगा, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी वैचारिक मतभेदों को एक बार फिर सतह पर ला सकता है।
