रंगों का भारत: क्या हमने अपनी पहचान खो दी है?
एक समय था जब भारत रंगों का देश कहलाता था। सदियों से, इस उपमहाद्वीप ने न केवल रंगों को अपनाया बल्कि ‘इंडिगो’ जैसे रंगों को अपना नाम भी दिया। ईसा पूर्व 2,500 वर्ष पहले से ही यहाँ रंगाई का प्रचलन था और रंगा हुआ सूती कपड़ा प्राचीन भारत के प्रमुख निर्यात में से एक था। यह जीवंतता केवल कपड़ों तक सीमित नहीं थी, बल्कि भोजन की थाली, मंदिरों की सजावट, शामियानों, वेशभूषा और यहाँ तक कि लोगों के ‘रंगीन मिजाज’ में भी झलकती थी।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अविजीत घोष बताते हैं, “भारत में रंग जीवन की भाषा और रूपक दोनों हैं। आप इसे हर जगह सुन और देख सकते हैं। यह राजस्थान के चमकीले गुलाबी पगड़ी में, बॉलीवुड नृत्य की बोल्ड पीली ब्लाउज में, तोते जैसी हरी मधुबनी पेंटिंग में, और माँ की रसोई में सजे मसालों में बोलता है।” घोष स्वयं “चटकीले रंग” की शर्ट पहनना पसंद करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि अब दुकानों में ऐसे रंग कम मिलते हैं और अच्छे दर्जी मिलना भी मुश्किल हो गया है। व्यस्त सड़कों पर दौड़ती ज्यादातर कारें सफेद, काली या ग्रे ही दिखती हैं।
सवाल उठता है कि आखिर रंगों का यह भारत अपने रंग क्यों खो रहा है? इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। एक प्रमुख कारण औपनिवेशिक मानसिकता और शिक्षा को माना जाता है। लेखकों और फिल्म निर्माताओं का मानना है कि औपनिवेशिक सोच यह थी कि परिष्कृत लोग दबे हुए रंगों का प्रयोग करते हैं, जबकि असभ्य लोग चमकीले रंगों का। फिल्म निर्माता और लेखिका पारोमिता वोहरा कहती हैं, “यह औपनिवेशिक धारणा है कि परिष्कृत लोग दबे हुए रंग पहनते हैं और असभ्य लोग चमकीले रंग पहनते हैं।”
इसके अतिरिक्त, केंद्रीयकृत फैशन उत्पादन और वैश्विक रुझानों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। वोहरा बताती हैं कि अब कपड़े दुकानों में पूर्वनिर्धारित तरीके से मिलते हैं। पहले लोग दर्जी से कपड़े सिलवाते थे, जिससे व्यक्तिगत पसंद का महत्व अधिक था। अब, व्यक्तिगत पसंद का दायरा कम होता जा रहा है क्योंकि स्वाद अक्सर दूसरों द्वारा तय किया जा रहा है। मिनिमलिस्ट फैशन के चलन में आने और यूनीक्लो (Uniqlo) और एच एंड एम (H&M) जैसे ब्रांडों के मुख्य रूप से बेसिक और न्यूट्रल रंग बेचने से ग्राहकों के लिए रंग विकल्प सीमित हो गए हैं। भारत की स्वतंत्रता संग्राम में खादी के उपयोग और उत्तर-औपनिवेशिक ‘ब्राउन साहिब’ और विदेशी संस्कृति के प्रति आकर्षित हस्तियों का उदय भी इस रंगहीनता में योगदान देता है। इस प्रकार, एक रंगीन भारत धीरे-धीरे अपनी रंगीन पहचान खोता नजर आ रहा है।
