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प्याज के भाव गिरे, किसान बेहाल: लागत निकालना भी हुआ मुश्किल

By Nov 20, 2025

नूंह जिले में प्याज की खेती करने वाले किसानों की उम्मीदें गिरते भावों के कारण टूट गई हैं। जिस उम्मीद से किसानों ने कड़ी मेहनत कर प्याज की फसल तैयार की थी, वह अब लागत निकालने की जद्दोजहद में उलझ गए हैं। किसानों का कहना है कि इस बार प्याज की खेती में लगा उनका पैसा भी वापस नहीं आ पा रहा है, जिससे वे भारी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।

पिछले साल जहां किसानों को प्याज के अच्छे दाम मिले थे और भाव 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया था, वहीं इस साल स्थिति बिल्कुल विपरीत है। मंडियों में प्याज की कीमत मात्र पांच रुपये किलो तक सिमट गई है। दाम में इस भारी अंतर को देखकर किसान चिंतित हैं कि वे अपनी लागत की भरपाई कैसे करेंगे।

हालांकि, सरकार द्वारा किसानों को राहत देने के लिए भावंतर भरपाई योजना लागू की गई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, इस योजना से भी किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है और उनकी आर्थिक तंगी दूर नहीं हो रही है। बागवानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार पूरे देश में प्याज की पैदावार उम्मीद से कहीं ज्यादा हुई है, जिसे ‘बंपर पैदावार’ कहा जा रहा है। इसी अतिरिक्त आवक के कारण बाजार में दामों में भारी गिरावट आई है। जिले में भी इस साल लगभग 7400 हेक्टेयर भूमि पर किसानों ने प्याज की खेती की है।

स्थानीय किसानों, जिनमें हसन मोहम्मद, हारून, साजिद हुसैन, असर खां, फजरू और अब्दुल्ला जैसे नाम शामिल हैं, ने बताया कि हर साल वे अच्छी कमाई की उम्मीद के साथ प्याज की खेती करते हैं। लेकिन इस बार अचानक आई कीमतों की गिरावट ने उनके सारे अरमानों पर पानी फेर दिया है। किसानों के अनुसार, एक एकड़ में प्याज की खेती करने में औसतन एक लाख रुपये से अधिक का खर्च आता है। यदि किसान किराये की जमीन पर खेती करता है, तो यह खर्च डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाता है। ऐसे में, मौजूदा पांच रुपये प्रति किलो के भाव से मुनाफा तो दूर, लागत वसूलना भी एक टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

किसानों का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। उन्होंने बताया कि इस बार फसल को फंगस और जड़ गलने जैसी बीमारियों ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है, जिससे फसल की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। रही-सही कसर बाजार में गिरे दामों ने पूरी कर दी है। उनकी मांग है कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे और प्याज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाकर या अन्य माध्यमों से किसानों को राहत प्रदान करे, ताकि वे इस मुश्किल दौर से उबर सकें।

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