चुनाव आयोग के इतिहास में फैसलों को लेकर कब-कब हुआ टकराव | national politics news
भारतीय चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता और तीन सदस्यीय संवैधानिक स्वरूप के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके भीतर फैसलों को लेकर आम सहमति हमेशा नहीं रही है (national politics news)। वर्तमान समय में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच एसआईआर प्रक्रिया और वोटर लिस्ट क्लीनअप को लेकर उपजा विवाद एक बार फिर इस बहस को केंद्र में ले आया है कि क्या शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी हर बार एकमत होते हैं। इतिहास गवाह है कि आयोग के भीतर अधिकारों और फैसलों को लेकर कई बार टकराव की स्थिति बन चुकी है।
नब्बे के दशक में टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त रहने के दौरान आयोग एक सदस्यीय से बहुसदस्यीय बना था। उस दौर में शेषन और अन्य आयुक्तों एमएस गिल व जीवीजी कृष्णमूर्ति के बीच अधिकारों के बंटवारे को लेकर तीखा गतिरोध देखने को मिला था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां यह स्पष्ट हुआ कि बहुमत का फैसला ही सर्वोपरि होगा। इसी प्रकार, साल 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने अपने ही सहयोगी नवीन चावला को पद से हटाने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी थी, जो संस्था के इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना थी।
वर्ष 2019 के आम चुनावों के दौरान भी अशोक लवासा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री और अन्य वरिष्ठ नेताओं को आचार संहिता के मामलों में मिली क्लीन चिट पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। ऐसे आंतरिक विवादों और असहमतियों से जनता के बीच संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ जाती है, जिससे लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरेदार की कार्यशैली पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है।
