दुर्गा शक्ति नागपाल पर up politics news के तहत आपराधिक अवमानना याचिका सूचीबद्ध
उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब गोण्डा जनपद के एक भूमि विवाद से जुड़े मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ आपराधिक अवमानना की याचिका सुनवाई के लिए आई। यह मामला एक स्थानीय अदालत के पीठासीन अधिकारी को कथित तौर पर फोन कॉल के जरिए प्रभावित करने के प्रयास से जुड़ा हुआ है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
गुरुवार को यह स्वतः संज्ञान मामला न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ के समक्ष पेश किया गया। हालांकि, सुनवाई की शुरुआत में ही न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए खुद को इस मामले से अलग कर लिया। नतीजतन, पीठ ने इस याचिका को मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष प्रस्तुत कर आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के बाद 9 सितंबर को फिर से सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब गोण्डा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान ने जिला न्यायाधीश को एक औपचारिक पत्र प्रेषित किया। इस पत्र में आरोप लगाया गया कि मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने 15 जुलाई को उन्हें फोन किया था। जज द्वारा एक लंबित मुकदमे के संबंध में बात करने से स्पष्ट इंकार करने पर कथित तौर पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया। साथ ही, मामले की गंभीरता को देखते हुए मुकदमे को अन्य अदालत में स्थानांतरित करने का भी अनुरोध किया गया था।
इससे पहले, एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया था कि न्यायपालिका के कामकाज में इस प्रकार का कथित हस्तक्षेप गंभीर चिंता का विषय है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत का मानना था कि बातचीत के लहजे और परिस्थितियों से प्रथम दृष्टा यह संकेत मिलता है कि न्यायिक अधिकारी को उसके कर्तव्यों के निर्वहन से विचलित करने का प्रयास किया गया था। इस प्रकरण के तूल पकड़ने से प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र के बीच संतुलन पर व्यापक चर्चा छिड़ गई है, जिसका सीधा असर आम जनता के बीच न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास पर पड़ता है।
